
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने वर्ष 2006 के एक सड़क हादसे से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाते हुए मृत 13 वर्षीय छात्र के परिजनों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने पहले दिए गए 1.50 लाख रुपये के मुआवजे को अपर्याप्त मानते हुए इसे बढ़ाकर 7.60 लाख रुपये कर दिया। जस्टिस अल्का सरीन की एकल पीठ ने अंबाला मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमसीएटी) के आदेश में संशोधन करते हुए यह निर्णय सुनाया और स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चों के मामलों में मुआवजा तय करते समय न्यायालयों को स्थापित कानूनी सिद्धांतों का पालन करना जरूरी है।

यह मामला कक्षा 8 में पढ़ने वाले छात्र दलीप कुमार की दुखद मौत से जुड़ा है, जिसकी 12 अप्रैल 2006 को एक सड़क दुर्घटना में जान चली गई थी। हादसे के बाद परिजनों ने मुआवजे की मांग को लेकर मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण, अंबाला का दरवाजा खटखटाया था। उस समय ट्रिब्यूनल ने परिवार को केवल 1.50 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया था। परिजनों ने इस रकम को बेहद कम बताते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि ट्रिब्यूनल ने मुआवजा तय करते समय कई महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं की अनदेखी की थी। अदालत ने कहा कि मृतक छात्र की संभावित आय का आकलन करते समय उसे पूरी तरह गैर-कमाऊ मान लेना उचित नहीं था। न्यायालय के अनुसार, भले ही बच्चा उस समय पढ़ाई कर रहा था, लेकिन भविष्य में उसकी आय की संभावना को ध्यान में रखना जरूरी है।
जस्टिस अल्का सरीन ने अपने फैसले में कहा कि मृतक की आय का निर्धारण “कुशल श्रमिक” की न्यूनतम मजदूरी के आधार पर किया जाना चाहिए था। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट ने न तो गुणक (multiplier) पद्धति लागू की और न ही अन्य स्थापित मापदंडों का सही इस्तेमाल किया। इसी वजह से दिया गया मुआवजा न्यायसंगत नहीं था।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने विशेष रूप से करुणा परमार बनाम प्रकाश सिन्हा, बेबी साक्षी ग्रेवाल मामले और हितेश नागीबाई पटेल प्रकरण का उल्लेख किया। इन फैसलों में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि नाबालिग बच्चों को मुआवजा तय करते समय पूरी तरह “गैर-कमाऊ” व्यक्ति मान लेना सही दृष्टिकोण नहीं है, क्योंकि हर बच्चे के उज्ज्वल भविष्य और संभावित कमाई की संभावना होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना दावा मामलों में न्यायालयों का दायित्व केवल औपचारिक मुआवजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार को वास्तविक और न्यायोचित राहत प्रदान करना है। अदालत ने माना कि ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया एकमुश्त मुआवजा स्थापित कानून के अनुरूप नहीं था और उसमें सुधार की आवश्यकता थी।
फैसले में अदालत ने मृतक छात्र की संभावित आय का आकलन कुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी के आधार पर किया और फिर गुणक पद्धति सहित अन्य कानूनी मानकों को लागू करते हुए मुआवजा पुनर्निर्धारित किया। इस प्रक्रिया के बाद कुल मुआवजा राशि 7.60 लाख रुपये तय की गई, जो पहले की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों में केवल वर्तमान आय नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं, परिवार की निर्भरता और बच्चे के जीवन की संभावित दिशा को भी ध्यान में रखना चाहिए। अदालत के अनुसार, एक होनहार छात्र की असमय मृत्यु से परिवार को केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि आर्थिक नुकसान भी होता है, जिसे मुआवजे में परिलक्षित होना चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य के मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। इससे मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों को यह संदेश जाता है कि नाबालिग पीड़ितों के मामलों में मुआवजा तय करते समय अधिक संवेदनशील और यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा।
परिजनों की ओर से दायर अपील में कहा गया था कि ट्रिब्यूनल ने बिना किसी ठोस गणना के केवल अनुमान के आधार पर बहुत कम राशि तय कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए माना कि न्यायाधिकरण का दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण था और उसमें सुधार आवश्यक था।
फैसले के बाद मृतक छात्र के परिवार को लंबे इंतजार के बाद राहत मिली है। करीब दो दशक पुराने इस मामले में हाईकोर्ट का हस्तक्षेप पीड़ित परिवार के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि न्याय केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि पीड़ितों को वास्तविक राहत पहुंचाने का माध्यम होना चाहिए।
यह निर्णय उन परिवारों के लिए भी उम्मीद लेकर आया है जो सड़क हादसों में अपने बच्चों को खो देते हैं और लंबे समय तक न्याय के लिए संघर्ष करते रहते हैं। हाईकोर्ट के इस आदेश से यह सिद्ध होता है कि यदि निचली अदालतों में मुआवजा कम तय हुआ हो, तो उच्च अदालतें हस्तक्षेप कर उसे न्यायसंगत स्तर तक बढ़ा सकती हैं।
कुल मिलाकर, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह फैसला मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि नाबालिग बच्चों के मामलों में संवेदनशीलता, कानूनी सिद्धांतों का सही प्रयोग और भविष्य की संभावनाओं का उचित आकलन—तीनों आवश्यक हैं, ताकि पीड़ित परिवारों को वास्तविक न्याय मिल सके।

