
स्क्रीन की कैद में बचपन—मोबाइल एडिक्शन पर संसद में उठी चिंता, सख्त नियमों की मांग
डिजिटल युग में जहां मोबाइल फोन ने जिंदगी को आसान बनाया है, वहीं इसका दूसरा पहलू अब खतरनाक रूप में सामने आ रहा है। खासतौर पर बच्चों और किशोरों के बीच मोबाइल और स्क्रीन की लत तेजी से बढ़ रही है, जो उनके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर गंभीर असर डाल रही है। हाल ही में संसद में उठी इस बहस ने पूरे देश का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा है।

राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता Derek O’Brien ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि मोबाइल फोन की लत अब एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले चुकी है। उन्होंने दावा किया कि हर साल करीब 20 हजार बच्चे केवल मोबाइल और स्क्रीन एडिक्शन के कारण आत्महत्या जैसा गंभीर कदम उठा लेते हैं। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि समस्या कितनी गहरी हो चुकी है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में बच्चे और युवा औसतन 7 से 8 घंटे तक मोबाइल फोन, टीवी या अन्य डिजिटल स्क्रीन पर समय बिता रहे हैं। इस आदत का सीधा असर उनकी दिनचर्या पर पड़ रहा है। बच्चों की नींद पूरी नहीं हो पा रही, वे देर रात तक जागते रहते हैं और सुबह थकान के साथ उठते हैं। इससे उनकी पढ़ाई और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है।
दुनिया के कई देशों ने इस खतरे को समय रहते पहचान लिया है। जानकारी के अनुसार, लगभग 68 देशों में स्कूलों के अंदर मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध या सख्त नियंत्रण लागू किया गया है। इन देशों का मानना है कि शिक्षा के माहौल में मोबाइल फोन बच्चों का ध्यान भटकाते हैं और उनके सीखने की प्रक्रिया को कमजोर करते हैं। भारत में भी अब इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
लोकसभा में भी इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई। कांग्रेस सांसद Deepender Singh Hooda ने बच्चों में बढ़ती सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज का युवा घंटों तक रील्स देखने, वीडियो गेम खेलने और बिना किसी उद्देश्य के स्क्रोलिंग करने में लगा रहता है। यह आदत धीरे-धीरे उनके व्यवहार और सोचने की क्षमता को प्रभावित कर रही है।
उन्होंने सरकार से अपील की कि बच्चों और किशोरों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं। उनका कहना था कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह समस्या और भी गंभीर हो सकती है।
ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी का बढ़ता चलन भी एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आया है। कई गेम्स में अब पैसे जीतने का लालच दिया जाता है, जिससे बच्चे जल्दी आकर्षित हो जाते हैं। “एविएटर” जैसे गेम्स में वर्चुअल तरीके से पैसे बढ़ाने का झांसा दिया जाता है, जबकि “लूडो” जैसे पारंपरिक खेल भी अब सट्टेबाजी का माध्यम बनते जा रहे हैं। यह स्थिति बच्चों को जुए जैसी आदतों की ओर धकेल रही है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे Facebook और Instagram पर इन गेम्स और सट्टेबाजी से जुड़े विज्ञापन खुलेआम दिखाई देते हैं। इससे बच्चों के लिए इन तक पहुंच और आसान हो जाती है। इसके साथ ही साइबर बुलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न की घटनाएं भी बढ़ रही हैं, जिससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में चिंता, अवसाद और सामाजिक अलगाव की भावना को बढ़ाता है। वे धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से कटने लगते हैं और वर्चुअल दुनिया में ज्यादा समय बिताने लगते हैं। इसका असर उनके रिश्तों और सामाजिक व्यवहार पर भी पड़ता है।
शारीरिक रूप से भी इसके कई नुकसान हैं। लंबे समय तक मोबाइल इस्तेमाल करने से आंखों की रोशनी पर असर पड़ता है, सिरदर्द और गर्दन दर्द जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। इसके अलावा, शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण मोटापा और अन्य बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
इस समस्या का समाधान केवल कानून बनाकर ही नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए समाज और परिवार की भी बड़ी जिम्मेदारी है। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए और उन्हें मोबाइल के बजाय अन्य रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए। घर में स्क्रीन टाइम को लेकर नियम तय करना भी जरूरी है।
स्कूलों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। बच्चों को डिजिटल संतुलन के बारे में जागरूक करना, खेलकूद और अन्य गतिविधियों को बढ़ावा देना जरूरी है। साथ ही, सरकार को भी जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को इस समस्या के प्रति सचेत करना चाहिए।
टेक्नोलॉजी कंपनियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उन्हें ऐसे फीचर्स विकसित करने चाहिए, जो बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने में मदद करें और उन्हें सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण प्रदान करें।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि मोबाइल फोन एक दोधारी तलवार की तरह है। इसका सही उपयोग जहां जीवन को आसान बनाता है, वहीं इसका अत्यधिक उपयोग बच्चों के भविष्य को खतरे में डाल सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम समय रहते इस समस्या को समझें और मिलकर इसका समाधान निकालें, ताकि बच्चों का बचपन सुरक्षित और खुशहाल रह सके।
