
सात साल तक बेटी का उत्पीड़न करने वाला पिता दोषी करार, मोगा कोर्ट ने सुनाई 20 साल की सख्त सजा; चाइल्ड हेल्पलाइन से खुला मामला
समाज को झकझोर देने वाले एक गंभीर मामले में पंजाब के मोगा जिले की अदालत ने एक पिता को अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ वर्षों तक यौन शोषण करने का दोषी ठहराते हुए कठोर सजा सुनाई है। अदालत ने आरोपी को 20 वर्ष के कारावास और आर्थिक दंड से दंडित किया है। इस फैसले को बाल सुरक्षा और न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मामले की शुरुआत तब हुई जब पीड़िता ने साहस जुटाकर अपनी पीड़ा सामने लाने का निर्णय लिया। बच्ची ने सहायता के लिए राष्ट्रीय बाल सहायता सेवा चाइल्ड हेल्पलाइन पर संपर्क किया, जिसके बाद पूरी घटना उजागर हुई और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सकी।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता ने शिकायत में बताया कि उसके पिता ने वर्ष 2015 से लेकर सितंबर 2022 तक लगातार उसका शारीरिक शोषण किया। वह लंबे समय तक भय और दबाव में जीती रही। आरोपी उसे धमकाता था कि यदि उसने किसी को कुछ बताया तो उसे जान से मार दिया जाएगा। विरोध करने पर वह बच्ची के साथ मारपीट भी करता था।
पीड़िता ने अपने बयान में यह भी बताया कि जब वह परिवार के अन्य सदस्यों—दादा-दादी या रिश्तेदारों—के पास सोने की कोशिश करती, तो पिता उसे जबरन अपने कमरे में ले जाता और अंदर से दरवाजा बंद कर देता। यह स्थिति कई वर्षों तक चलती रही।
मामले की संवेदनशीलता इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि पीड़िता की मां का निधन पहले ही हो चुका था। मां के न होने के कारण बच्ची पूरी तरह असुरक्षित हो गई थी और उसे बचाने वाला घर में कोई नहीं था। यही वजह रही कि वह लंबे समय तक चुप रही और डर के माहौल में जीती रही।
कुछ समय बाद, परिवार के बुजुर्गों की सलाह पर बच्ची अपने ननिहाल चली गई। वहां उसे अपेक्षाकृत सुरक्षित वातावरण मिला और उसने हिम्मत जुटाकर अपनी पीड़ा साझा करने का निर्णय लिया। उसने बताया कि वह अपने पिता को उसके अपराध की सजा दिलाना चाहती थी ताकि उसे न्याय मिल सके और भविष्य में कोई अन्य बच्चा ऐसी यातना का शिकार न बने।
करीब डेढ़ साल बाद, पढ़ाई के दौरान उसे स्कूल की किताब में बाल सहायता नंबर दिखाई दिया। यह नंबर उसके लिए उम्मीद की किरण बन गया। उसने तुरंत फोन कर अपनी आपबीती बताई। इसके बाद संबंधित एजेंसियां सक्रिय हुईं और बच्ची को कानूनी व मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई गई।
प्राथमिक जांच के बाद महिला पुलिस थाने में उसके बयान दर्ज किए गए और कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। मामला अदालत में पहुंचा जहां अभियोजन पक्ष ने साक्ष्यों, बयान और परिस्थितियों के आधार पर आरोपी के खिलाफ मजबूत केस पेश किया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि आरोपी ने पिता-पुत्री के पवित्र संबंध का गंभीर दुरुपयोग किया और बच्ची के विश्वास को तोड़ा। अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर अपराध मानते हुए कठोर सजा सुनाई। साथ ही आर्थिक जुर्माना भी लगाया गया ताकि पीड़िता के पुनर्वास में सहायता मिल सके।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला समाज में एक मजबूत संदेश देता है कि बच्चों के खिलाफ अपराधों को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि कानून पीड़ितों के साथ खड़ा है, चाहे अपराधी परिवार का ही सदस्य क्यों न हो।
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले में बच्ची के साहस की सराहना की है। उनका कहना है कि अक्सर बच्चे डर, शर्म या सामाजिक दबाव के कारण अपनी पीड़ा साझा नहीं कर पाते। ऐसे में सहायता सेवाओं की जानकारी और जागरूकता बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों में बच्चों को सुरक्षा, अधिकारों और हेल्पलाइन नंबरों के बारे में शिक्षित करना अत्यंत आवश्यक है। यदि बच्चे जानेंगे कि मदद कहां मिल सकती है, तो वे समय रहते अपनी आवाज उठा सकेंगे।
यह घटना इस बात की भी याद दिलाती है कि परिवार हमेशा सुरक्षित स्थान हो, यह जरूरी नहीं। इसलिए समाज, स्कूल, पड़ोस और संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के व्यवहार में बदलाव को समझें और जरूरत पड़ने पर मदद करें।
फिलहाल अदालत के फैसले के बाद पीड़िता को न्याय मिलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रशासन और बाल संरक्षण एजेंसियां अब उसके पुनर्वास, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य सहायता पर ध्यान दे रही हैं ताकि वह सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सके।
यह मामला दर्दनाक जरूर है, लेकिन यह भी दिखाता है कि साहस, जागरूकता और सही सहायता मिलने पर न्याय संभव है।


