
“माफ करना मां-पापा…”: अंबाला में 26 वर्षीय युवक की आत्महत्या, सुसाइड नोट में पत्नी और साथी पर गंभीर आरोप
हरियाणा के अंबाला जिले के नारायणगढ़ क्षेत्र से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिसने एक परिवार को गहरे शोक में डुबो दिया। वार्ड नंबर 12 निवासी 26 वर्षीय तरुण कुमार ने 23 अप्रैल को अपने घर में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने न केवल परिवार, बल्कि पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। मामले को और गंभीर बना दिया उस सुसाइड नोट ने, जो युवक की जेब से बरामद हुआ और जिसमें उसने अपनी मौत का कारण अपनी पत्नी और उसके कथित साथी को बताया है।

जानकारी के अनुसार, घटना के समय तरुण की मां किसी धार्मिक कार्यक्रम, कीर्तन, में गई हुई थीं। जब वह घर लौटीं तो दरवाजा अंदर से बंद मिला। किसी तरह दरवाजा खोलने पर उन्होंने देखा कि उनका बेटा चुनरी के सहारे फंदे से लटका हुआ है। यह दृश्य देखकर वह बेसुध हो गईं। शोर सुनकर पड़ोसी मौके पर पहुंचे और पुलिस को सूचना दी गई।
सूचना मिलते ही नारायणगढ़ थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शव को नीचे उतारकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। जांच के दौरान पुलिस को तरुण की जेब से तीन पन्नों का एक सुसाइड नोट मिला। इस नोट में तरुण ने बेहद भावुक शब्दों में अपने माता-पिता और भाई से माफी मांगी। उसने लिखा—“सॉरी मां, सॉरी पापा, सॉरी भाई… मैं अच्छा बेटा नहीं बन पाया।” यह पंक्तियां पढ़कर हर किसी की आंखें नम हो गईं।
सुसाइड नोट में तरुण ने अपनी पत्नी ईशा को अपनी मौत का कारण बताया है। उसने लिखा कि वह लंबे समय से उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रही थी। साथ ही उसने ईशा के साथ रहने वाले मनीष सैणी का भी जिक्र किया और उन दोनों पर उसे परेशान करने का आरोप लगाया। हालांकि, इस नोट पर तरुण के हस्ताक्षर नहीं मिले हैं, जिससे पुलिस इसकी पुष्टि के लिए हैंडराइटिंग जांच करवा रही है।
मृतक के पिता हरीश कुमार ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि उनके बेटे ने करीब आठ साल पहले यमुनानगर की रहने वाली ईशा से प्रेम विवाह किया था। दोनों का एक बेटा भी है, जिसकी उम्र करीब साढ़े छह साल है। शादी के शुरुआती सालों में सब कुछ सामान्य था, लेकिन धीरे-धीरे दोनों के रिश्ते में तनाव बढ़ने लगा।
पिता के अनुसार, करीब चार साल पहले ईशा अपने पति को छोड़कर काला आंब में रहने लगी। इस घटना के बाद तरुण गहरे मानसिक तनाव में चला गया और धीरे-धीरे नशे का आदी हो गया। परिवार ने कई बार उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन हालात सुधर नहीं पाए।
हरीश कुमार ने आरोप लगाया कि ईशा अब अंबली निवासी मनीष सैणी के साथ रह रही थी और दोनों मिलकर तरुण को लगातार प्रताड़ित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि उनका बेटा कई बार इस बारे में शिकायत करता था और बेहद परेशान रहता था।
घटना से एक दिन पहले, यानी 22 अप्रैल को, तरुण काला आंब स्थित एक कंपनी में नौकरी के लिए गया था। वहीं उसकी पत्नी भी पहुंच गई और दोनों के बीच विवाद हो गया। पिता का आरोप है कि इस दौरान ईशा ने तरुण के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया और उसे अपमानित किया।
इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कंपनी के कुछ सुरक्षा गार्डों ने, कथित रूप से ईशा के कहने पर, तरुण के साथ मारपीट की। इस घटना ने उसे अंदर तक तोड़ दिया। वह किसी तरह घर लौटा, लेकिन मानसिक रूप से बेहद कमजोर हो चुका था। अगले ही दिन उसने यह खौफनाक कदम उठा लिया।
नारायणगढ़ थाना प्रभारी ने बताया कि मृतक के पिता की शिकायत के आधार पर तरुण की पत्नी ईशा, उसके कथित साथी मनीष सैणी और काला आंब स्थित एक कंपनी के कुछ सुरक्षा गार्डों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। यह मामला आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा 108 के तहत दर्ज किया गया है।
पुलिस ने जांच शुरू कर दी है और सभी आरोपों की सत्यता की जांच की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग जांच के साथ-साथ अन्य साक्ष्यों को भी एकत्र किया जा रहा है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
इस घटना ने समाज में कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या रिश्तों में बढ़ती दूरी और संवाद की कमी लोगों को इस हद तक धकेल रही है? क्या मानसिक तनाव को हम अब भी गंभीरता से नहीं ले रहे? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में समय रहते परामर्श और समर्थन मिलना बेहद जरूरी है।
तरुण की मौत ने उसके परिवार को पूरी तरह से तोड़ दिया है। माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। उनका कहना है कि उनका बेटा बेहद सीधा और भावुक था, जो इस तरह की प्रताड़ना सहन नहीं कर पाया।
स्थानीय लोग भी इस घटना से स्तब्ध हैं और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर समय रहते हस्तक्षेप होता, तो शायद एक युवा की जान बचाई जा सकती थी।
यह घटना एक कड़वा सच सामने लाती है—मानसिक उत्पीड़न और पारिवारिक विवाद किसी भी व्यक्ति को अंदर से तोड़ सकते हैं। जरूरत है कि हम अपने आसपास के लोगों की भावनाओं को समझें, उनसे संवाद करें और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करें।
अंततः, यह मामला केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी भी है। हमें यह समझना होगा कि किसी भी व्यक्ति की मानसिक स्थिति को नजरअंदाज करना कितना खतरनाक हो सकता है। अगर समय रहते कदम उठाए जाएं, तो ऐसी कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।

