
महिलाओं के दिल पर बढ़ता अदृश्य खतरा: कम ब्लॉकेज में भी ज्यादा जोखिम, नई रिसर्च ने बदली सोच
हृदय रोग को लंबे समय तक पुरुषों की बीमारी माना जाता रहा, लेकिन आधुनिक चिकित्सा शोध अब इस धारणा को बदल रहे हैं। हालिया अध्ययन बताते हैं कि महिलाओं में धमनियों में जमा प्लाक भले कम दिखाई दे, लेकिन उसका प्रभाव अधिक खतरनाक हो सकता है। यही कारण है कि महिलाएं अपेक्षाकृत कम अवरोध के बावजूद दिल के दौरे, सीने में दर्द और अन्य हृदय संबंधी जटिलताओं का सामना कर रही हैं।

यह महत्वपूर्ण अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल Circulation Journal में प्रकाशित हुआ है, जिसमें बताया गया कि महिलाओं में हृदय संबंधी गंभीर घटनाओं का जोखिम तब शुरू हो जाता है जब धमनियों में प्लाक का स्तर लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंचता है। इसके विपरीत पुरुषों में यह जोखिम सामान्यतः 28 प्रतिशत या उससे अधिक स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसका अर्थ है कि महिलाओं का दिल संरचनात्मक रूप से अधिक संवेदनशील हो सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार इसका मुख्य कारण महिलाओं की कोरोनरी धमनियों का आकार है। प्रमुख शोध संस्थान Harvard Medical School से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि महिलाओं की धमनियां अपेक्षाकृत संकरी होती हैं। ऐसे में उनमें थोड़ी सी रुकावट भी रक्त प्रवाह को गंभीर रूप से बाधित कर सकती है। परिणामस्वरूप, कम प्लाक होने पर भी हृदय पर दबाव बढ़ जाता है और जोखिम तेजी से बढ़ने लगता है।
इस अध्ययन में अमेरिका और कनाडा के 193 चिकित्सा केंद्रों से 4,267 मरीजों का डेटा शामिल किया गया। प्रतिभागियों की औसत आयु लगभग 60 वर्ष थी और इनमें महिलाओं की संख्या पुरुषों से थोड़ी अधिक थी। शोध में पाया गया कि पुरुषों में प्लाक की उपस्थिति लगभग 75 प्रतिशत मामलों में देखी गई, जबकि महिलाओं में यह 55 प्रतिशत रही। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह थी कि महिलाओं में प्लाक की मात्रा कम होने के बावजूद गंभीर हृदय घटनाओं की संभावना ज्यादा थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह अंतर केवल शरीर की बनावट तक सीमित नहीं है। हार्मोनल बदलाव, जीवनशैली, तनाव और सामाजिक परिस्थितियां भी महिलाओं में हृदय रोग के खतरे को प्रभावित करती हैं। खासकर रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, जिससे धमनियों की सुरक्षा कम हो जाती है और प्लाक बनने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
भारतीय संदर्भ में यह खतरा और गंभीर रूप ले सकता है। यहां महिलाओं में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता तेजी से बढ़ रही है। डॉक्टरों का मानना है कि भारतीय महिलाओं में हृदय रोग अक्सर कम उम्र में भी दिखाई देने लगा है। इसका एक कारण यह भी है कि महिलाएं अपने स्वास्थ्य की तुलना में परिवार की जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देती हैं, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है।
नई दिल्ली स्थित AIIMS Delhi के विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं में हृदय रोग के लक्षण कई बार अलग होते हैं, इसलिए उनका समय पर पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। पुरुषों में जहां तेज सीने का दर्द प्रमुख संकेत होता है, वहीं महिलाओं में अत्यधिक थकान, सांस फूलना, मतली, चक्कर आना, गर्दन या पीठ दर्द जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इन संकेतों को सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि महिलाओं में पेट के आसपास जमा चर्बी यानी एब्डोमिनल फैट हृदय रोग का बड़ा कारण बन रही है। यह फैट शरीर में सूजन बढ़ाता है और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है। इसके अलावा तनाव, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधि की कमी भी जोखिम को बढ़ाते हैं।
विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अब हृदय रोग के इलाज और जांच में लिंग आधारित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। महिलाओं के लिए अलग जोखिम मूल्यांकन, अलग जांच मानक और अलग उपचार रणनीतियां विकसित करनी होंगी। उदाहरण के लिए, डॉक्टरों का कहना है कि महिलाओं में हृदय की जांच के लिए केवल पारंपरिक टेस्ट पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आधुनिक इमेजिंग तकनीकों का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए।
रोकथाम के स्तर पर भी महिलाओं को जागरूक करने की जरूरत है। नियमित स्वास्थ्य जांच, संतुलित आहार, कम नमक और कम वसा वाला भोजन, रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम, तनाव प्रबंधन और पर्याप्त नींद जैसे उपाय हृदय को स्वस्थ रखने में बेहद प्रभावी साबित हो सकते हैं। साथ ही धूम्रपान और शराब से दूरी भी जरूरी है।
परिवार और समाज की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। अक्सर महिलाएं अपने स्वास्थ्य को लेकर गंभीर नहीं होतीं क्योंकि वे दूसरों की देखभाल में व्यस्त रहती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि परिवार को महिलाओं को समय पर जांच कराने के लिए प्रेरित करना चाहिए और उन्हें अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
यह अध्ययन एक स्पष्ट संदेश देता है कि हृदय रोग महिलाओं के लिए भी उतना ही बड़ा खतरा है जितना पुरुषों के लिए, बल्कि कुछ मामलों में उससे भी अधिक जटिल हो सकता है। कम ब्लॉकेज का मतलब सुरक्षित होना नहीं है, और यही सोच बदलने की सबसे ज्यादा जरूरत है।
यदि समय रहते जागरूकता बढ़ाई जाए, नियमित जांच कराई जाए और महिलाओं के लिए विशेष शोध को बढ़ावा दिया जाए, तो हृदय रोग से होने वाली कई गंभीर घटनाओं को रोका जा सकता है। महिलाओं के दिल की सुरक्षा अब केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का मुद्दा भी बन चुका है।
