देश

बारिश, ओले और बर्फ से बदला मौसम का मिजाज: उत्तर भारत में तबाही, आगे गर्मी और कमजोर मानसून की चेतावनी

उत्तर भारत में इन दिनों मौसम ने अचानक करवट लेकर आम जनजीवन से लेकर खेती-किसानी तक पर गहरा असर डाला है। जहां एक तरफ पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी और भूस्खलन ने यातायात को प्रभावित किया, वहीं दूसरी ओर मैदानी इलाकों में तेज बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। इस असामान्य मौसम ने न केवल तापमान में गिरावट लाई है, बल्कि आने वाले महीनों को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।

पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता के कारण जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भारी बर्फबारी और बारिश दर्ज की गई। ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ की मोटी परत जमने से कई प्रमुख मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं। भूस्खलन की घटनाओं के कारण राजमार्गों पर लंबा जाम लग गया और सैकड़ों वाहन रास्ते में फंस गए। यात्रियों को घंटों तक इंतजार करना पड़ा, जबकि प्रशासन को राहत और बचाव कार्य में जुटना पड़ा।

मैदानी क्षेत्रों की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं रही। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेज हवाओं के साथ बारिश और ओलावृष्टि ने खेतों में खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। खासकर गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलें कटाई के ठीक पहले खराब हो गईं। कई जगहों पर ओलों की मार इतनी तेज थी कि फसलें पूरी तरह जमीन पर गिर गईं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक झटका लगा है।

दिल्ली और आसपास के इलाकों में इस बारिश से तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। दिन में हल्की ठंडक और रात में ठंडी हवाओं के कारण लोगों को कुछ राहत तो मिली है, लेकिन मौसम के इस अचानक बदलाव से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी सामने आने लगी हैं। डॉक्टरों के अनुसार, ऐसे मौसम में वायरल बुखार, सर्दी-जुकाम और एलर्जी के मामले बढ़ सकते हैं।

उत्तर भारत के अलावा देश के कई अन्य हिस्सों में भी मौसम का असर देखने को मिला है। झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में भी कई स्थानों पर ओलावृष्टि और बारिश हुई। ओडिशा और तटीय आंध्र प्रदेश में भारी वर्षा के कारण जलभराव की स्थिति बन गई। वहीं पूर्वोत्तर राज्यों, कोंकण-गोवा और गुजरात के कुछ हिस्सों में भी बारिश दर्ज की गई है।

मौसम विभाग के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम पश्चिमी विक्षोभ के कारण हुआ है, जो इस समय उत्तर-पश्चिम भारत पर सक्रिय है। आमतौर पर यह प्रणाली सर्दियों में ज्यादा प्रभावी होती है, लेकिन इस बार इसका असर वसंत के अंत तक देखने को मिल रहा है, जो असामान्य माना जा रहा है।

हालांकि, वर्तमान में जो ठंडक और बारिश देखने को मिल रही है, वह अस्थायी राहत है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले महीनों में स्थिति पूरी तरह बदल सकती है। निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2026 में भारत को ‘सुपर अल नीनो’ के प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है, जिससे गर्मी बढ़ेगी और मानसून कमजोर हो सकता है।

अल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। भारत में इसका सीधा असर मानसून पर देखने को मिलता है। स्काईमेट के अनुसार, इस साल जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसूनी बारिश सामान्य से कम रह सकती है।

अनुमान है कि इस वर्ष मानसून की कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत का लगभग 94 प्रतिशत ही रहेगी। खासतौर पर मानसून के दूसरे चरण में बारिश में कमी आ सकती है। इसका असर खेती, जल संसाधनों और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।

इसके साथ ही अप्रैल से जून के बीच भीषण गर्मी की आशंका जताई गई है। उत्तर भारत, मध्य भारत और उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों में लू के दिनों की संख्या सामान्य से अधिक रह सकती है। दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में भी गर्मी का असर ज्यादा देखने को मिल सकता है। इससे लोगों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर राज्यों में भी तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में अप्रैल के दौरान सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति असंतुलित रहने की आशंका है।

यूरोपीय मौसम एजेंसियों के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रशांत महासागर में हवा की गति धीमी हो रही है, जो अल नीनो के प्रभाव को बढ़ा सकती है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में मौसम और अधिक अस्थिर हो सकता है।

किसानों के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। एक ओर जहां वर्तमान में ओलावृष्टि और बारिश ने उनकी फसलों को नुकसान पहुंचाया है, वहीं दूसरी ओर भविष्य में कमजोर मानसून और सूखे की आशंका उनके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रही है। ऐसे में सरकार को समय रहते राहत और सहायता के उपाय करने होंगे।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव भी इस पूरे घटनाक्रम में साफ नजर आ रहे हैं। मौसम का असामान्य व्यवहार, अचानक बारिश, ओलावृष्टि और फिर अत्यधिक गर्मी—ये सभी संकेत हैं कि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

कुल मिलाकर, उत्तर भारत में इस समय जो मौसम का बदलाव देखने को मिल रहा है, वह केवल एक अस्थायी घटना नहीं है, बल्कि यह आने वाले बड़े परिवर्तनों का संकेत भी है। जहां फिलहाल बारिश और ठंडक से राहत मिली है, वहीं भविष्य में गर्मी और सूखे का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में सतर्कता और तैयारी ही इस चुनौती से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका होगा।

Join WhatsApp Channel Join Now
Subscribe and Follow on YouTube Subscribe
Follow on Facebook Follow
Follow on X-twitter Follow
Download from Google Play Store Download

Related Articles

Back to top button