
“न्यायालय के फैसले के बाद बढ़ा विवाद, पैतृक संपत्ति की लड़ाई में भाई-बहन की मौत”
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के नरैनी क्षेत्र में पैतृक संपत्ति को लेकर वर्षों से चल रहे विवाद ने सोमवार को दर्दनाक रूप ले लिया। न्यायालय के हालिया फैसले के बाद उपजे तनाव और पारिवारिक कलह के चलते भाई-बहन ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। यह मामला अब पुलिस जांच के दायरे में है।

मामला रामनगर अतर्रा रोड निवासी प्रकाशचंद्र गुप्ता के परिवार से जुड़ा है। प्रकाशचंद्र चार भाइयों में से एक हैं। वर्ष 2004 में चारों भाइयों के बीच संपत्ति का विधिवत बंटवारा हो चुका था। सबसे छोटे भाई सुभाषचंद्र गुप्ता का अपनी पत्नी सुधा गुप्ता से लंबे समय से विवाद चल रहा था।
वर्ष 2010 में सुभाषचंद्र ने अपने हिस्से की दुकान और मकान अपने भतीजों आनंद प्रकाश और भाष्कर गुप्ता के नाम 3.40 लाख रुपये में रजिस्ट्री कर दी। उस समय सुधा गुप्ता मायके में रह रही थीं। बाद में उन्होंने इस रजिस्ट्री को चुनौती देते हुए नरैनी न्यायालय में वर्ष 2015 में वाद दायर किया।
करीब दस साल तक चले मुकदमे के बाद 19 जनवरी 2026 को न्यायालय ने सुधा गुप्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। फैसले में सुधा को मकान में हिस्सा, दुकान का किराया, जेवर के एक लाख रुपये और दो हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया गया।
फैसले के बाद रविवार रात सुधा गुप्ता अपने पति के पैतृक घर पहुंचीं और आदेश के अनुसार हिस्सेदारी व रुपये की मांग की। इसी दौरान आनंद प्रकाश और उनकी बहन सुभ्रता से तीखी बहस हो गई। परिवार के अन्य सदस्यों ने बीच-बचाव की कोशिश की, लेकिन मामला शांत नहीं हुआ।
अगले दिन सोमवार दोपहर आनंद और सुभ्रता घर से निकले। काफी देर तक जब वे वापस नहीं लौटे तो परिजनों को चिंता हुई। कुछ समय बाद स्थानीय लोगों ने बागै नदी किनारे दो शव पड़े होने की सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और जांच में सामने आया कि दोनों ने जहर खाकर आत्महत्या की है।
घटनास्थल से जहर के पाउच और एक स्कूटी बरामद की गई है। पुलिस ने दोनों शवों को सीएचसी नरैनी पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
परिजनों का आरोप है कि विवाद के दौरान सुधा गुप्ता द्वारा किए गए तानों और मानसिक दबाव के चलते यह कदम उठाया गया। वहीं पुलिस का कहना है कि सभी पहलुओं की जांच की जा रही है और जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला दिखाता है कि कानूनी लड़ाई के फैसले के बाद यदि संवेदनशीलता और संवाद न हो, तो परिणाम कितना भयावह हो सकता है। एक संपत्ति विवाद ने दो पढ़े-लिखे युवाओं की जान ले ली और एक पूरे परिवार को जिंदगी भर का दर्द दे गया।



