
न्यायपालिका का पर्यावरण-हितैषी कदम: कागज की पुरानी परंपरा खत्म, हर साल बड़ी बचत
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी फैसला लेते हुए न्यायिक कार्यप्रणाली में दशकों से चली आ रही अंग्रेजी दौर की परंपरा को समाप्त कर दिया है। अब अदालतों में याचिकाएं, हलफनामे और अन्य कानूनी दस्तावेज ए-4 साइज के कागज पर दोनों तरफ प्रिंट कर जमा किए जा सकेंगे। इस बदलाव से न केवल न्यायिक प्रक्रिया अधिक आधुनिक और व्यावहारिक बनेगी, बल्कि पर्यावरण को भी बड़ी राहत मिलेगी। अनुमान है कि इस फैसले से हर साल करीब 21 हजार पेड़ और 168 करोड़ लीटर पानी की बचत होगी।

यह महत्वपूर्ण बदलाव चंडीगढ़ निवासी विवेक तिवारी और अंजलि द्वारा दायर एक याचिका के बाद संभव हो सका। याचिका में अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया गया कि आज भी अदालतों में ए-3 साइज के लीगल पेपर और एकतरफा प्रिंटिंग की व्यवस्था लागू है, जो औपनिवेशिक काल की देन है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जब प्रिंटिंग तकनीक और स्याही की गुणवत्ता में इतना विकास हो चुका है, तब पुराने नियमों को जारी रखना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह है।
दरअसल, ब्रिटिश शासनकाल में बनाए गए नियम उस समय की तकनीकी सीमाओं को ध्यान में रखकर तैयार किए गए थे। उस दौर में कागज की गुणवत्ता मोटी होती थी और स्याही अक्सर दूसरी तरफ फैल जाती थी, जिससे दोनों ओर छपाई संभव नहीं थी। इसी वजह से एक तरफ प्रिंटिंग और बड़े आकार के लीगल पेपर का चलन शुरू हुआ। लेकिन आज आधुनिक प्रिंटर, बेहतर स्याही और उच्च गुणवत्ता वाले कागज के कारण ये समस्याएं पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं।
हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान माना कि समय के साथ नियमों में बदलाव होना जरूरी है। अदालत ने कहा कि तकनीकी प्रगति के बावजूद अगर पुराने औपनिवेशिक नियमों को ढोया जाए, तो यह संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी है। इसी सोच के साथ अदालत ने ए-4 साइज के कागज और डबल-साइड प्रिंटिंग को मंजूरी दे दी। यह व्यवस्था अब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ की सभी अधीनस्थ अदालतों और ट्रिब्यूनल में भी लागू होगी।
इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ पर्यावरण को होगा। सुप्रीम कोर्ट की इंडियन ज्यूडिशियरी एनुअल रिपोर्ट के मुताबिक, केवल पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में एक साल के भीतर लगभग 3 करोड़ 9 लाख पन्नों का इस्तेमाल होता है। अगर हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ की सभी अदालतों को शामिल कर लिया जाए, तो यह आंकड़ा 30.54 करोड़ पन्नों तक पहुंच जाता है। इतनी बड़ी मात्रा में कागज की खपत का सीधा असर जंगलों की कटाई और जल संसाधनों पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कागज उद्योग में पेड़ों की कटाई के साथ-साथ पानी की भारी खपत होती है। एक अनुमान के अनुसार, एक टन कागज बनाने में हजारों लीटर पानी खर्च होता है। ऐसे में अदालतों जैसी बड़ी संस्थाओं द्वारा कागज की खपत को आधा करना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। हाईकोर्ट के इस निर्णय से हर साल हजारों पेड़ कटने से बचेंगे और करोड़ों लीटर पानी संरक्षित रहेगा।
इसके अलावा, यह फैसला न्यायिक व्यवस्था को अधिक सुविधाजनक भी बनाएगा। ए-4 साइज के कागज आमतौर पर आसानी से उपलब्ध होते हैं और फाइलों का आकार भी छोटा रहता है। इससे दस्तावेजों का रखरखाव, भंडारण और एक अदालत से दूसरी अदालत तक भेजना आसान होगा। वकीलों और अदालत कर्मचारियों के लिए भी फाइलें संभालना सरल हो जाएगा, जिससे समय और श्रम दोनों की बचत होगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश की अन्य अदालतों के लिए भी एक उदाहरण बनेगा। यदि अन्य हाईकोर्ट और न्यायिक संस्थान भी इसी तरह के पर्यावरण-अनुकूल कदम उठाते हैं, तो पूरे देश में कागज की खपत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इससे सरकारी खर्च भी घटेगा और पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलेगा।
कुल मिलाकर, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल नियमों में बदलाव नहीं, बल्कि सोच में बदलाव का प्रतीक है। औपनिवेशिक परंपराओं से आगे बढ़ते हुए आधुनिक तकनीक और पर्यावरण संतुलन को महत्व देना आज के समय की जरूरत है। यह फैसला साबित करता है कि न्यायपालिका भी समय के साथ बदल रही है और समाज को सकारात्मक दिशा देने में अपनी जिम्मेदारी निभा रही है।


