
दिल्ली में कोका-कोला की बोतलों का खौफनाक सच: घर में फट गईं दो बोतलें, बुजुर्ग बीमार पड़े; 13 साल बाद अदालत ने सुनाया फैसला
दिल्ली के एक सामान्य परिवार के लिए साल 2012 की एक शाम जिंदगी भर का डर और संघर्ष छोड़ गई। घर में रखी कोका-कोला की बोतलें अचानक बम की तरह फट पड़ीं। दीवारें गंदगी से भर गईं, घरेलू सामान बर्बाद हो गया और सबसे अहम—परिवार के बुजुर्ग सदस्यों की सेहत पर इसका गहरा असर पड़ा। अब, पूरे 13 साल बाद, उपभोक्ता अदालत ने इस मामले में बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है

अदालत का दो टूक फैसला
दिल्ली जिला उपभोक्ता अदालत ने कोका-कोला से जुड़ी दोनों कंपनियों—हिंदुस्तान कोका-कोला बेवरेज प्राइवेट लिमिटेड और कोका-कोला इंडिया प्राइवेट लिमिटेड—को आदेश दिया है कि वे पीड़ित परिवार को 1 लाख रुपये मुआवजा और 50 हजार रुपये कानूनी खर्च अदा करें।
अदालत ने साफ कहा कि यदि कंपनी चार सप्ताह के भीतर भुगतान नहीं करती, तो उस राशि पर ब्याज भी लगाया जाएगा। पीठ ने इस मामले को कंपनियों की गंभीर लापरवाही और अनुचित व्यापार व्यवहार का उदाहरण बताया।
‘जैसे किचन में बम फटा हो’
इस केस के शिकायतकर्ता तरुण राजपाल हैं, जो उस समय बायोटेक्नोलॉजी के छात्र थे। तरुण ने 2012 में दिल्ली के एक रिलायंस फ्रेश स्टोर से कोका-कोला की छह बोतलें (प्रत्येक 2 लीटर) खरीदी थीं।
11 अगस्त 2012 की शाम अचानक किचन में रखी एक बोतल जोरदार धमाके के साथ फट गई। आवाज इतनी तेज थी कि घर के लोग दहशत में आ गए। तरुण के मुताबिक, ऐसा लगा मानो किसी ने किचन में विस्फोट कर दिया हो।
फर्श, दीवारें और आसपास रखा सामान पूरी तरह गंदा हो गया। कुछ घरेलू वस्तुएं गर्म तेल में गिर गईं, जिससे और नुकसान हुआ।
डर से बीमार पड़ी मां
इस हादसे का सबसे गहरा असर तरुण की मां पर पड़ा। 68 वर्षीय मां, जो पहले से हाई ब्लड प्रेशर की मरीज थीं, धमाके से बुरी तरह घबरा गईं। उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और उन्हें डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा।
इस दौरान घर में रखा माइक्रोवेव, वॉटर प्यूरीफायर, मिक्सर और मोबाइल फोन भी खराब हो गए। परिवार अभी पहले सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि दूसरा झटका इंतजार कर रहा था।
पांच दिन बाद फिर धमाका
घटना के ठीक पांच दिन बाद, घर में रखी दूसरी कोका-कोला बोतल और भी ज्यादा जोरदार धमाके के साथ फट गई। इस बार हालात और गंभीर हो गए।
तरुण के 75 वर्षीय पिता, जो दिल की बीमारी से पीड़ित हैं, इस धमाके से बुरी तरह डर गए। उनकी हालत इतनी बिगड़ी कि उन्हें दिल का दौरा पड़ने जैसी स्थिति में तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा।
कंपनी का बेरुखा रवैया
परिवार ने इस पूरे मामले की शिकायत कोका-कोला से जुड़ी कंपनियों से की। तरुण का आरोप है कि शुरुआत में कंपनी के अधिकारी बात करते रहे, लेकिन बाद में उन्होंने फोन उठाना बंद कर दिया।
कई ईमेल, कॉल और दफ्तरों के चक्कर लगाने के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकला। कंपनी की ओर से पहले नया टीवी और मोबाइल देने का वादा किया गया, लेकिन बाद में उससे भी इनकार कर दिया गया।
न्याय के लिए लंबी लड़ाई
कंपनी की लगातार अनदेखी से तंग आकर तरुण ने 2013 में उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद शुरू हुआ एक लंबा कानूनी संघर्ष—तारीखें, सुनवाई और इंतजार।
अब 13 साल बाद अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर बोतलें घर में सुरक्षित रखी गई थीं, तो उनके फटने की जिम्मेदारी उपभोक्ता की नहीं बल्कि कंपनी की है।
उपभोक्ताओं के लिए अहम संदेश
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि खाद्य और पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनियों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। उपभोक्ताओं की जान और सेहत से जुड़ी लापरवाही किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
यह फैसला सिर्फ एक परिवार के लिए राहत नहीं है, बल्कि लाखों उपभोक्ताओं के लिए एक मजबूत संदेश है—अगर आप गलत हैं, तो बड़ी कंपनी भी आपको इंसाफ देने से नहीं बच सकती।



