
जंग के साये में करियर का संकट: ईरान में पढ़ रहे भारतीय मेडिकल छात्रों का भविष्य अधर में
श्चिम एशिया में जारी तनाव और संघर्ष का असर अब केवल सीमाओं और राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव आम लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। खासकर ईरान में मेडिकल शिक्षा प्राप्त कर रहे लगभग 3000 भारतीय छात्रों का भविष्य गहरे संकट में आ गया है। अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने इन छात्रों के सपनों पर अनिश्चितता का साया डाल दिया है।

भारत के विभिन्न राज्यों, विशेषकर जम्मू-कश्मीर से बड़ी संख्या में छात्र हर साल ईरान का रुख करते हैं। वहां कम खर्च में मेडिकल शिक्षा उपलब्ध होने के कारण यह देश भारतीय छात्रों के लिए एक आकर्षक विकल्प रहा है। लेकिन बीते एक वर्ष में बदलते हालात ने इस विकल्प को जोखिम में बदल दिया है।
तीन बार बाधित हुई पढ़ाई
छात्रों के अनुसार जून 2025 से अब तक उनकी पढ़ाई तीन बार प्रभावित हो चुकी है। हर बार जब हालात सामान्य होने की उम्मीद बनती है, तभी कोई नया तनाव या सैन्य गतिविधि सामने आ जाती है। इसका सीधा असर उनकी कक्षाओं, परीक्षाओं और पूरे शैक्षणिक सत्र पर पड़ा है।
कई छात्रों ने बताया कि विश्वविद्यालयों में नियमित कक्षाएं चलाना मुश्किल हो गया है। प्रोफेसर और स्टाफ भी असुरक्षित माहौल के कारण पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में छात्रों की पढ़ाई लगातार पिछड़ती जा रही है।
अधूरी परीक्षाएं और रुका हुआ सत्र
फरवरी 2026 में जब स्थिति बिगड़ी, तब भारत सरकार की एडवाइजरी के बाद कई छात्र अपनी परीक्षाएं अधूरी छोड़कर भारत लौट आए। उस समय उन्हें उम्मीद थी कि हालात जल्दी सुधरेंगे और वे वापस जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर लेंगे।
लेकिन अब अप्रैल का महीना आ चुका है और न तो परीक्षाएं आयोजित हो पाई हैं और न ही नया सत्र ठीक से शुरू हो सका है। इससे छात्रों का पूरा एकेडमिक कैलेंडर अस्त-व्यस्त हो गया है। कई छात्रों को डर है कि उनका एक साल या उससे अधिक समय बर्बाद हो सकता है।
इंटरनेट बंद, ऑनलाइन पढ़ाई भी ठप
शुरुआती दिनों में छात्रों को ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई जारी रखने की सुविधा मिल रही थी। वे भारत में रहते हुए भी इंटरनेट के जरिए अपनी कक्षाओं से जुड़े हुए थे। लेकिन अब इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गई हैं, जिससे ऑनलाइन पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई है।
इस स्थिति ने छात्रों को पूरी तरह असहाय बना दिया है। उनके पास न तो क्लास है, न परीक्षा और न ही कोई स्पष्ट योजना कि आगे क्या होगा।
युद्धविराम के बाद भी नहीं लौटा भरोसा
हालांकि हाल के दिनों में युद्धविराम (सीजफायर) की खबरें आई हैं, लेकिन छात्रों और उनके परिवारों का भरोसा अभी भी नहीं लौटा है। उनका कहना है कि पिछले अनुभवों ने उन्हें यह सिखा दिया है कि हालात कभी भी अचानक बिगड़ सकते हैं।
अभिभावकों का डर भी स्वाभाविक है। वे अपने बच्चों को ऐसे माहौल में दोबारा भेजने के लिए तैयार नहीं हैं, जहां उनकी सुरक्षा और पढ़ाई दोनों पर खतरा मंडरा रहा हो।
मानसिक दबाव और अनिश्चितता
इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है। लगातार बदलते हालात, पढ़ाई में रुकावट और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने उन्हें तनाव में डाल दिया है।
कई छात्रों ने बताया कि वे चिंता और घबराहट का सामना कर रहे हैं। कुछ छात्रों को यह डर सता रहा है कि उनका डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह सकता है। यह स्थिति उनके आत्मविश्वास और मनोबल पर भी असर डाल रही है।
सरकार से ठोस कदम की मांग
छात्रों ने भारत सरकार से अपील की है कि उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए तत्काल हस्तक्षेप किया जाए। उनका कहना है कि सरकार को उनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि वे अपनी पढ़ाई बिना किसी रुकावट के जारी रख सकें।
छात्रों की प्रमुख मांग है कि उन्हें किसी अन्य सुरक्षित देश में ट्रांसफर किया जाए। इसके अलावा वे यह भी चाहते हैं कि उनकी अब तक की पढ़ाई को मान्यता दी जाए, ताकि उनका समय और मेहनत व्यर्थ न जाए।
वैकल्पिक रास्तों पर विचार
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान निकालना आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है। सरकार चाहें तो अन्य देशों के विश्वविद्यालयों के साथ समझौता कर इन छात्रों को वहां स्थानांतरित कर सकती है।
इसके अलावा भारत में भी विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं, जैसे ब्रिज कोर्स या विशेष परीक्षाएं, जिससे ये छात्र अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। हालांकि इसके लिए मेडिकल काउंसिल और अन्य संस्थाओं की मंजूरी जरूरी होगी।
आर्थिक और भावनात्मक दबाव
छात्रों के परिवारों पर भी इस संकट का गहरा असर पड़ा है। उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा के लिए भारी खर्च किया है। अब अगर पढ़ाई अधूरी रह जाती है, तो यह उनके लिए आर्थिक रूप से बड़ा झटका होगा।
इसके साथ ही भावनात्मक दबाव भी कम नहीं है। माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे सुरक्षित रहें और उनका भविष्य भी सुरक्षित हो।
उम्मीद की किरण
हालांकि हालात चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन छात्रों को अभी भी उम्मीद है कि सरकार उनकी समस्या को समझेगी और जल्द ही कोई समाधान निकालेगी। पहले भी कई बार संकट के समय सरकार ने विदेशों में फंसे भारतीयों की मदद की है।
जरूरत इस बात की है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए और समय रहते ठोस कदम उठाए जाएं। क्योंकि हर गुजरता दिन इन छात्रों के सपनों को और अधिक धुंधला कर रहा है।
निष्कर्ष
ईरान में पढ़ रहे भारतीय मेडिकल छात्रों की स्थिति आज बेहद नाजुक हो चुकी है। उनके सपने, उनकी मेहनत और उनका भविष्य सभी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं।
यह केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार, शैक्षणिक संस्थान और समाज मिलकर इस समस्या का समाधान निकालें, ताकि इन छात्रों के .सपनों को टूटने से बचाया जा सके।
