
ईरान पर अमेरिका-इस्राइल हमले को लेकर सियासी घमासान, कांग्रेस ने केंद्र सरकार से मांगा स्पष्ट रुख
ईरान पर अमेरिका और इस्राइल द्वारा किए गए कथित हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा तेज हो गई है। इस मुद्दे पर कई देशों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं और इसे लेकर वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक बहस भी बढ़ रही है। भारत में भी यह मामला अब राजनीतिक मुद्दा बन गया है। कांग्रेस ने इस विषय को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि इतने गंभीर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भारत को अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।

कांग्रेस नेताओं ने इस दौरान स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज के बयान की खुलकर सराहना की है। सांचेज ने अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों की आलोचना करते हुए इसे गंभीर गलती बताया है। उनका कहना है कि इस तरह की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे वैश्विक शांति व्यवस्था को खतरा पैदा हो सकता है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि स्पेन के प्रधानमंत्री का बयान काफी साहसिक है और यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर सही बात कहने का साहस होना चाहिए। रमेश के अनुसार किसी भी देश को अपने सहयोगियों के गलत कदमों पर भी स्पष्ट रूप से बोलना चाहिए।
जयराम रमेश ने अपने बयान में यह भी कहा कि जब कोई देश या सहयोगी सही काम करता है तो उसका समर्थन करना स्वाभाविक है, लेकिन यदि वह गलती करता है तो उसे यह बताना भी उतना ही आवश्यक होता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ईमानदारी और स्पष्टता बेहद महत्वपूर्ण होती है।
कांग्रेस ने इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। जयराम रमेश ने कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री का इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया न देना कई सवाल खड़े करता है। उन्होंने इसे कूटनीतिक संकोच और हिचकिचाहट का संकेत बताया। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार को वैश्विक मुद्दों पर स्पष्ट और सिद्धांत आधारित नीति अपनानी चाहिए।
स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने हाल ही में एक बयान में कहा था कि ईरान पर अमेरिका और इस्राइल द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई एक असाधारण गलती है। उन्होंने कहा कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानून के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। सांचेज का मानना है कि इस तरह के सैन्य हमले वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बन सकते हैं और इससे तनाव और बढ़ सकता है।
सांचेज ने यह भी कहा कि मित्र देशों के बीच संबंधों का आधार केवल समर्थन नहीं होना चाहिए, बल्कि ईमानदारी भी होनी चाहिए। उनका कहना था कि जब कोई सहयोगी देश सही निर्णय लेता है तो उसका समर्थन करना चाहिए, लेकिन यदि वह गलती करता है तो उसे स्पष्ट रूप से बताना भी उतना ही जरूरी है।
स्पेन के प्रधानमंत्री का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हाल के वर्षों में उन्होंने कई बार अमेरिका की नीतियों की खुलकर आलोचना की है। खास तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति को लेकर सांचेज कई बार असहमति जता चुके हैं। ईरान से जुड़े इस मुद्दे पर भी उन्होंने अमेरिका के रुख से दूरी बनाई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई के दौरान अपने सहयोगी देशों से समर्थन की उम्मीद की थी। हालांकि स्पेन ने इस मामले में अलग रुख अपनाया। स्पेन सरकार ने अमेरिका को अपने सैन्य अड्डों से ईरान पर हमले के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इस फैसले को यूरोप में एक स्वतंत्र कूटनीतिक रुख के रूप में देखा गया।
स्पेन के इस निर्णय के बाद अमेरिका की ओर से भी कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले पर नाराजगी जताई और संकेत दिया कि स्पेन के साथ व्यापारिक संबंधों पर पुनर्विचार किया जा सकता है। ट्रंप ने कहा कि यदि सहयोगी देश अमेरिका की नीतियों का समर्थन नहीं करते हैं तो इसका असर आर्थिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।
स्थिति तब और विवादित हो गई जब व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव की ओर से यह दावा किया गया कि स्पेन ने अमेरिकी संदेश को समझ लिया है और वह अमेरिकी सेना के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है। हालांकि स्पेन के विदेश मंत्री ने इस बयान का खंडन किया और स्पष्ट किया कि स्पेन ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है। कई देशों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या किसी देश द्वारा दूसरे देश पर इस तरह की सैन्य कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है या नहीं। ईरान पर हुए हमलों ने पश्चिम एशिया क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।
भारत में भी इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस का कहना है कि भारत को वैश्विक मंच पर शांति, संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का समर्थन करना चाहिए। पार्टी का मानना है कि भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश को इस प्रकार के मुद्दों पर स्पष्ट और संतुलित बयान देना चाहिए।
हालांकि केंद्र सरकार की ओर से अभी तक इस मामले में कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। आमतौर पर भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय विवादों पर प्रतिक्रिया देते समय काफी सावधानी बरतती है और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है। भारत के अमेरिका, इस्राइल और ईरान तीनों के साथ अलग-अलग रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की विदेश नीति अक्सर संतुलन पर आधारित होती है। एक ओर भारत अमेरिका और इस्राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग के संबंध भी बनाए हुए है। ऐसे में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना भारत के लिए कूटनीतिक रूप से जटिल हो सकता है।
फिलहाल ईरान पर हुए हमलों और उससे जुड़े विवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं जारी हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस मुद्दे पर विभिन्न देशों की सरकारें क्या रुख अपनाती हैं और वैश्विक राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है। भारत में भी यह विषय राजनीतिक बहस का हिस्सा बना हुआ है और विपक्ष लगातार केंद्र सरकार से इस मामले पर स्पष्ट बयान देने की मांग कर रहा है।
