
स्मार्ट मीटर सिस्टम पर उठे सवाल: भुगतान के बाद भी नहीं लौट रही बिजली, यूपी में उपभोक्ता बेहाल
उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से लागू की गई स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। सरकार की मंशा थी कि इस नई तकनीक के जरिए पारदर्शिता बढ़ेगी, बिजली चोरी रुकेगी और उपभोक्ताओं को अपनी खपत पर बेहतर नियंत्रण मिलेगा। लेकिन जमीनी स्तर पर जो स्थिति बन रही है, वह इसके बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है। बड़ी संख्या में उपभोक्ता इस सिस्टम से परेशान हैं, क्योंकि बिल जमा करने के बावजूद भी घंटों तक बिजली आपूर्ति बहाल नहीं हो रही है।

प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आ रही शिकायतें इस समस्या की व्यापकता को दर्शाती हैं। उन्नाव के एक उपभोक्ता का कनेक्शन बैलेंस खत्म होने के कारण कट गया। उन्होंने तुरंत रिचार्ज कर दिया, लेकिन बिजली आपूर्ति बहाल होने में पूरे 24 घंटे लग गए। वहीं लखनऊ में एक अन्य उपभोक्ता को बिल भुगतान के बाद करीब चार घंटे तक अंधेरे में रहना पड़ा। ये घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि अब आम होती जा रही हैं।
स्मार्ट प्रीपेड मीटर की खासियत यह है कि यह पूरी तरह ऑटोमैटिक सिस्टम पर आधारित है। जैसे ही उपभोक्ता का बैलेंस खत्म होता है, बिजली आपूर्ति स्वतः बंद हो जाती है। इसी तरह, भुगतान करने के बाद सिस्टम के जरिए ही कनेक्शन दोबारा जोड़ा जाता है। लेकिन यही ऑटोमैटिक प्रक्रिया अब सबसे बड़ी समस्या बन गई है, क्योंकि इसमें मैनुअल हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत कम है।
प्रदेश में इस समय लगभग 78 लाख उपभोक्ताओं के यहां स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं, जिनमें से करीब 70.50 लाख प्रीपेड मोड में हैं। इतनी बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं के एक साथ इस सिस्टम पर आने से सर्वर पर भारी दबाव पड़ रहा है। नतीजतन, भुगतान के बाद कनेक्शन जोड़ने की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पा रही है।
बिजली विभाग का दावा है कि बिल जमा करने के दो घंटे के भीतर आपूर्ति बहाल हो जानी चाहिए, लेकिन वास्तविकता में कई उपभोक्ताओं को इससे कहीं ज्यादा इंतजार करना पड़ रहा है। इससे लोगों में नाराजगी बढ़ रही है और वे बिजली विभाग के कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हो रहे हैं।
इस समस्या ने बिजली विभाग के कर्मचारियों की भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पहले जहां कर्मचारी सीधे तौर पर कनेक्शन जोड़ या काट सकते थे, अब यह पूरी प्रक्रिया केंद्रीकृत हो गई है। प्रदेश में बने मीटर डेटा मैनेजमेंट सेंटर (MDM) के माध्यम से ही कनेक्शन बहाल किया जाता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर तैनात अभियंता चाहकर भी तुरंत समस्या का समाधान नहीं कर पा रहे हैं।
अक्सर देखा जा रहा है कि अभियंता उपभोक्ताओं की रसीदें और शिकायतें अपने आंतरिक ग्रुप्स में साझा कर रहे हैं और उच्च अधिकारियों से मदद मांग रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सिस्टम में तकनीकी स्तर पर गंभीर खामियां मौजूद हैं।
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या की मुख्य वजह सर्वर की क्षमता का कम होना है। जैसे ही बड़ी संख्या में लोग एक साथ रिचार्ज करते हैं, सिस्टम पर लोड बढ़ जाता है और वह धीमा पड़ जाता है या हैंग हो जाता है। इससे रीकनेक्शन की प्रक्रिया बाधित होती है।
इसके अलावा, कई उपभोक्ताओं को सिस्टम की कार्यप्रणाली की पूरी जानकारी नहीं है। स्मार्ट मीटर में बैलेंस कम होने पर उपभोक्ताओं को तीन बार अलर्ट मैसेज भेजे जाते हैं—पहला तब जब 30 प्रतिशत बैलेंस बचता है, दूसरा 10 प्रतिशत पर और तीसरा बैलेंस खत्म होने पर। लेकिन कई बार उपभोक्ता इन संदेशों को नजरअंदाज कर देते हैं या उनके मोबाइल नंबर अपडेट नहीं होते, जिससे उन्हें समय पर जानकारी नहीं मिल पाती।
एक और बड़ी समस्या पुराने बकाये को लेकर सामने आई है। जब पोस्टपेड मीटर को प्रीपेड में बदला जाता है, तो उपभोक्ताओं का पुराना बकाया भी सिस्टम में जुड़ जाता है। हर बार जब उपभोक्ता रिचार्ज करता है, तो उस राशि का एक हिस्सा पुराने बकाये में स्वतः कट जाता है। इससे उपभोक्ताओं को यह समझने में परेशानी होती है कि उनका बैलेंस इतनी जल्दी क्यों खत्म हो रहा है।
हालांकि, बिजली विभाग ने उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए कई विकल्प उपलब्ध कराए हैं। रिचार्ज के लिए मोबाइल एप, वेबसाइट, डिजिटल पेमेंट ऐप्स और जन सुविधा केंद्रों का सहारा लिया जा सकता है। इसके अलावा, प्रीपेड उपभोक्ताओं को दो प्रतिशत की छूट भी दी जा रही है।
विभाग का कहना है कि अगर भुगतान के दो घंटे के भीतर बिजली आपूर्ति बहाल नहीं होती है, तो उपभोक्ता 1912 हेल्पलाइन नंबर पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए एक विशेष टीम भी बनाई गई है, जो ऐसी शिकायतों का समाधान करने का प्रयास करती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई बार शिकायत करने के बाद भी समाधान में देरी होती है।
इस पूरी स्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इतनी बड़ी आबादी पर एक साथ इस नई तकनीक को लागू करना सही निर्णय था। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले इस सिस्टम का छोटे स्तर पर परीक्षण होना चाहिए था, ताकि खामियों को समय रहते दूर किया जा सके।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना का उद्देश्य भले ही अच्छा हो, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई कमियां सामने आई हैं। यदि इन समस्याओं का जल्द समाधान नहीं किया गया, तो यह योजना उपभोक्ताओं के लिए राहत के बजाय परेशानी का कारण बनी रहेगी।
आने वाले समय में सरकार और बिजली विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे इस सिस्टम को मजबूत, तेज और भरोसेमंद बनाएं। तभी यह योजना अपने असली उद्देश्य को पूरा कर पाएगी और उपभोक्ताओं का भरोसा जीत सकेगी।



