
सूद का जाल: 50 हजार के कर्ज ने छीनी जमीन, अब मकान पर भी मंडरा रहा खतरा
आजमगढ़। तरवां थाना क्षेत्र के हंसराजपुर मोहल्ले की एक विधवा महिला की व्यथा जिले में फैल चुके सूदखोरी के जाल की भयावह तस्वीर सामने लाती है। 50 हजार रुपये का कर्ज चुकाने के बाद भी ब्याज खत्म नहीं हुआ। उल्टा, हालात ऐसे बने कि महिला को अपनी एक बीघा जमीन बेचनी पड़ी। आरोप है कि 27 लाख रुपये की पूरी रकम सूदखोरों ने हड़प ली और अब उनकी नजर परिवार के घर पर टिक गई है।

हंसराजपुर की रहने वाली आशा देवी के पति कमलेश चौहान का देहांत हो चुका है। चार बेटियों और दो बेटों के साथ उनका परिवार किसी तरह गुजर-बसर कर रहा है। वर्ष 2022 में उनके बेटे सूरज चौहान ने खरिहानी बाजार में वेल्डिंग की दुकान शुरू करने के लिए परिचितों से 50 हजार रुपये उधार लिए। परिवार का कहना है कि सात माह के भीतर मूलधन और तय ब्याज चुका दिया गया था।
लेकिन आरोप है कि कर्ज चुकाने के बावजूद सूदखोरों की मांगें खत्म नहीं हुईं। दुकान पर पहुंचकर अतिरिक्त ब्याज की मांग की जाने लगी। गाली-गलौज और धमकियों का सिलसिला शुरू हो गया। सूरज को जान से मारने की धमकी दी गई। जब परिवार ने विरोध किया तो दबंग घर तक पहुंच गए। छोटे बच्चों और महिला को डराया-धमकाया गया।
आशा देवी का कहना है कि लगातार बढ़ते दबाव और भय के कारण उन्होंने अपनी एक बीघा जमीन 27 लाख रुपये में बेच दी। जमीन का बैनामा अपने ही पट्टीदार के नाम किया गया, लेकिन आरोप है कि बिक्री की पूरी रकम सूदखोरों ने अलग-अलग खातों में जबरन ट्रांसफर करा ली। जान-माल की सुरक्षा के डर से महिला को यह कदम उठाना पड़ा।
इसके बावजूद मामला शांत नहीं हुआ। पीड़िता का आरोप है कि अब आरोपी घर की बची संपत्ति पर कब्जा करने की धमकी दे रहे हैं। लगातार मानसिक दबाव के चलते उनका बेटा सूरज घर छोड़कर चला गया था। काफी प्रयासों के बाद उसे लखनऊ से वापस लाया गया। परिवार आज भी दहशत में जी रहा है।
इस मामले में 5 अगस्त 2025 को प्राथमिकी दर्ज की गई थी, लेकिन अब तक आरोप-पत्र दाखिल नहीं हुआ है। आशा देवी ने पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना-पत्र देकर सुरक्षा और वसूली गई धनराशि वापस दिलाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो पूरा परिवार बेघर हो सकता है।
जिले में जड़ें जमा चुका है सूदखोरी का नेटवर्क
आजमगढ़ में इस तरह के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। जून 2024 में फूलपुर क्षेत्र में तीन लाख रुपये के कर्ज के बदले 16 लाख रुपये वसूलने और फिर भी बकाया बताकर प्रताड़ित करने का मामला दर्ज हुआ था। वहीं 2021 में एक व्यक्ति को 50 हजार रुपये के कर्ज के विवाद में मारपीट कर रेलवे ट्रैक पर फेंकने की घटना ने जिले को झकझोर दिया था।
इन घटनाओं से साफ है कि सूदखोरी का धंधा संगठित रूप ले चुका है। जरूरतमंद लोग मामूली रकम के लिए कर्ज लेते हैं, लेकिन ऊंचे ब्याज, ब्लैंक चेक और धमकियों के जाल में फंसकर अपनी जमीन-जायदाद गंवा बैठते हैं।
प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
कानून में सूदखोरी को अपराध माना गया है, फिर भी लगातार सामने आ रहे मामलों से सवाल उठते हैं कि रोकथाम के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे। क्या पीड़ितों का डर उन्हें खुलकर शिकायत करने से रोकता है? या फिर कार्रवाई में देरी से आरोपियों के हौसले बढ़ रहे हैं?
आशा देवी की कहानी सिर्फ एक परिवार का संघर्ष नहीं, बल्कि उस कड़वी सच्चाई की तस्वीर है जिसमें आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर कुछ लोग दूसरों की जिंदगी तबाह कर रहे हैं। अब देखना यह है कि पुलिस प्रशासन इस मामले में कितनी तेजी और सख्ती दिखाता है।



