
सिंघु बॉर्डर कांड में कोर्ट का बड़ा फैसला—चारों निहंग आरोपियों को मिली राहत, जांच पर उठे सवाल
नई दिल्ली: किसान आंदोलन के दौरान देश को झकझोर देने वाले सिंघु बॉर्डर हत्याकांड में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चारों निहंग आरोपियों को बरी कर दिया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुभाष चंद्र सरोए की अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस और पर्याप्त सबूत पेश करने में असफल रहा, जिसके चलते उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस फैसले के बाद पुलिस की जांच प्रक्रिया और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

यह मामला 15 अक्तूबर 2021 की सुबह का है, जब सिंघु बॉर्डर पर किसान आंदोलन के मंच के पास एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई थी। पुलिस बैरिकेड पर एक व्यक्ति का शव उल्टा लटका हुआ मिला था। बाद में उसकी पहचान पंजाब के तरनतारन जिले के चीमा खुर्द गांव निवासी लखबीर सिंह के रूप में हुई। शव की स्थिति बेहद भयावह थी—उसके शरीर पर कई चोटों के निशान थे और एक हाथ कटा हुआ था, जिससे इस घटना की क्रूरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
घटना के तुरंत बाद निहंग समुदाय से जुड़े लोगों ने दावा किया कि लखबीर सिंह ने पवित्र ‘सरबलोह ग्रंथ’ की बेअदबी करने का प्रयास किया था। इसी आरोप के चलते उसे यह सजा दी गई। इस दावे ने मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया और देशभर में इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
घटना के दिन ही शाम को पहला आरोपी सरबजीत सिंह पुलिस के सामने पेश हुआ और आत्मसमर्पण कर दिया। इसके अगले दिन नारायण सिंह, भगवंत सिंह और गोविंद प्रीत सिंह ने भी खुद को पुलिस के हवाले कर दिया और हत्या की जिम्मेदारी ली। इन चारों के सामने आने के बाद पुलिस ने मामले को सुलझा हुआ मानते हुए जांच को आगे बढ़ाया।
जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर कुछ अहम सबूत जुटाने का दावा किया। इनमें वह रस्सी भी शामिल थी, जिसका इस्तेमाल शव को बैरिकेड पर लटकाने के लिए किया गया था। पुलिस ने इन साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ मजबूत केस तैयार करने की कोशिश की और अदालत में चार्जशीट दाखिल की।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पंजाब सरकार ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन भी किया था। इस टीम का उद्देश्य घटना के हर पहलू की गहन जांच करना और यह पता लगाना था कि क्या इस हत्या के पीछे कोई बड़ी साजिश थी। मृतक लखबीर सिंह के परिवार, खासकर उनकी बहन राजविंदर कौर ने भी सरकार से मांग की थी कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और सच्चाई सामने लाई जाए।
हालांकि, अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष अपने दावों को मजबूत सबूतों के साथ साबित नहीं कर पाया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि केवल आरोपियों के कथित बयानों या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जब तक आरोप सिद्ध करने के लिए पुख्ता सबूत न हों, तब तक सजा देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
इसी आधार पर अदालत ने चारों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतनी गंभीर घटना में भी जांच एजेंसियां ठोस सबूत क्यों नहीं जुटा सकीं।
मामले से जुड़ा एक और पहलू यह भी है कि एक आरोपी अमन सिंह की गिरफ्तारी अब तक नहीं हो सकी है। अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया था, जिससे यह संकेत मिलता है कि जांच अभी भी अधूरी रह गई है।
इस फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में दोष सिद्ध करने के लिए साक्ष्यों का मजबूत और विश्वसनीय होना बेहद जरूरी होता है। यदि जांच में कहीं भी कमी रह जाती है या सबूतों को सही तरीके से पेश नहीं किया जाता, तो आरोपी को सजा दिलाना मुश्किल हो जाता है।
वहीं, इस फैसले से मृतक के परिवार और समाज के एक वर्ग में निराशा भी देखने को मिल रही है। लोगों का कहना है कि इतनी गंभीर और अमानवीय घटना के बावजूद अगर आरोपी बरी हो जाते हैं, तो इससे न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है।
सिंघु बॉर्डर हत्याकांड केवल एक आपराधिक मामला नहीं था, बल्कि यह सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील था। ऐसे में इस पर आया फैसला और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि इस मामले ने देश की जांच और न्याय प्रणाली के सामने कई चुनौतियां उजागर की हैं। अब यह देखना होगा कि क्या इस फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील की जाती है या नहीं, और क्या भविष्य में ऐसे मामलों में जांच और अभियोजन को और अधिक मजबूत बनाया जा सकेगा, ताकि न्याय सुनिश्चित हो सके।

