
वर्ल्ड स्लीप डे 2026: कम होती नींद युवाओं के लिए खतरे की घंटी, डिजिटल आदतें बढ़ा रहीं मानसिक संकट
आधुनिक दौर में तकनीक ने जीवन को बेहद आसान बना दिया है, लेकिन इसके साथ कई नई समस्याएं भी सामने आई हैं। इनमें सबसे बड़ी समस्या युवाओं और किशोरों में तेजी से घटती नींद है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और देर रात तक इंटरनेट का इस्तेमाल अब युवाओं की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नींद की कमी केवल थकान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर मानसिक स्वास्थ्य, व्यवहार और जीवनशैली पर भी गहरा पड़ता है।

वर्ल्ड स्लीप डे के मौके पर जारी रिपोर्ट और विभिन्न शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव और ज्यादा खतरनाक हो सकता है। नींद की कमी से अवसाद, चिड़चिड़ापन, आक्रामक व्यवहार और यहां तक कि आत्महत्या की प्रवृत्ति तक बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
बदलती जीवनशैली का असर
कुछ दशक पहले तक बच्चों और युवाओं की दिनचर्या काफी संतुलित होती थी। वे दिन भर पढ़ाई, खेल और सामाजिक गतिविधियों में व्यस्त रहते थे और रात में समय पर सो जाते थे। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। स्मार्टफोन और इंटरनेट की उपलब्धता ने युवाओं की जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है।
आज कई किशोर देर रात तक सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब या ऑनलाइन गेम्स पर घंटों समय बिताना आम बात हो गई है। यही कारण है कि सोने का समय लगातार पीछे खिसकता जा रहा है और नींद की अवधि घटती जा रही है।
नींद विशेषज्ञों का कहना है कि रात में स्क्रीन देखने से दिमाग लगातार सक्रिय रहता है, जिससे शरीर को आराम नहीं मिल पाता। मोबाइल या लैपटॉप से निकलने वाली नीली रोशनी दिमाग को यह संकेत देती है कि अभी जागने का समय है। इससे शरीर में नींद लाने वाले हार्मोन का स्तर कम हो जाता है और व्यक्ति को देर तक नींद नहीं आती।
किशोरों में नींद की भारी कमी
विभिन्न शोधों से यह सामने आया है कि दुनिया भर में बड़ी संख्या में किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 60 से 70 प्रतिशत किशोर रोजाना जरूरी नींद से वंचित रह जाते हैं।
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के आंकड़ों के अनुसार लगभग 73 प्रतिशत हाई स्कूल के छात्र स्कूल के दिनों में आठ घंटे से भी कम सोते हैं। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरों के लिए रोजाना 8 से 10 घंटे की नींद जरूरी होती है।
भारत में भी स्थिति काफी चिंताजनक है। कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि देश में लगभग 80 से 90 प्रतिशत किशोर किसी न किसी स्तर पर नींद की कमी से जूझ रहे हैं। कई छात्रों ने यह स्वीकार किया है कि वे पढ़ाई, मोबाइल और मनोरंजन के कारण देर रात तक जागते रहते हैं।
व्यवहार पर पड़ता है सीधा असर
नींद की कमी का सबसे बड़ा असर व्यक्ति के व्यवहार पर दिखाई देता है। जब किसी किशोर की नींद पूरी नहीं होती, तो वह अधिक चिड़चिड़ा और अस्थिर हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, ध्यान केंद्रित न कर पाना और जल्दी थक जाना जैसे लक्षण आम हो जाते हैं।
शोध बताते हैं कि जो किशोर रात में सात घंटे से कम सोते हैं, उनमें आक्रामक व्यवहार की संभावना आठ घंटे या उससे अधिक सोने वाले किशोरों की तुलना में लगभग डेढ़ से दो गुना ज्यादा होती है।
स्कूलों में किए गए अध्ययनों से यह भी सामने आया है कि जिन छात्रों को पर्याप्त नींद नहीं मिलती, उनमें झगड़े और बुलिंग की घटनाएं ज्यादा होती हैं। आंकड़ों के अनुसार ऐसे छात्रों में मारपीट और विवाद के मामले 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक देखे गए हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर
नींद केवल शरीर के आराम के लिए ही जरूरी नहीं होती, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। जब किसी व्यक्ति को लगातार कम नींद मिलती है, तो उसके दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है।
कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में पाया गया है कि नींद की कमी का संबंध अवसाद और चिंता से भी जुड़ा हुआ है। जिन लोगों को लंबे समय तक नींद से जुड़ी समस्याएं रहती हैं, उनमें मानसिक तनाव और उदासी की समस्या अधिक देखने को मिलती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नींद की कमी से आत्महत्या के विचार आने का खतरा भी बढ़ सकता है। शोध बताते हैं कि जिन लोगों को नींद से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनमें आत्महत्या के विचार या प्रयास का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में दो से तीन गुना तक अधिक हो सकता है।
बढ़ते आत्महत्या के आंकड़े
भारत में आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी भी चिंता का विषय बनती जा रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार पिछले दस वर्षों में आत्महत्या के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है।
वर्ष 2013 में जहां देश में आत्महत्या के लगभग 1.34 लाख मामले दर्ज किए गए थे, वहीं 2023 में यह संख्या बढ़कर 1.71 लाख से ज्यादा हो गई।
छात्रों के बीच आत्महत्या के मामलों में भी तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है। वर्ष 2013 में छात्र आत्महत्या के 8,423 मामले सामने आए थे, जबकि 2023 तक यह संख्या बढ़कर 13,892 तक पहुंच गई। यह करीब 65 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।
हालांकि आत्महत्या के पीछे कई सामाजिक और व्यक्तिगत कारण होते हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि मानसिक तनाव और नींद की कमी भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह
नींद विशेषज्ञों का कहना है कि अगर लोग अपनी दिनचर्या में कुछ बदलाव करें तो इस समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है। कलकत्ता स्लीप सोसाइटी के विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी और गुणवत्तापूर्ण नींद संपूर्ण स्वास्थ्य की बुनियाद होती है।
युवाओं को सोने से पहले मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल कम करना चाहिए। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बनाना फायदेमंद होता है। इसके अलावा रोजाना एक निश्चित समय पर सोने और जागने की आदत भी विकसित करनी चाहिए।
जागरूकता की जरूरत
इस समस्या से निपटने के लिए केवल युवाओं को ही नहीं बल्कि परिवार और समाज को भी जिम्मेदारी निभानी होगी। माता-पिता को बच्चों की डिजिटल आदतों पर नजर रखनी चाहिए और उन्हें संतुलित जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
स्कूलों में भी छात्रों को नींद और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में जागरूक किया जाना जरूरी है। अगर किशोर पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली नींद लेते हैं, तो इससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होगा।
निष्कर्ष
डिजिटल युग में तकनीक से दूरी बनाना संभव नहीं है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है। युवाओं के लिए पर्याप्त नींद उतनी ही जरूरी है जितनी पढ़ाई, खेल और अन्य गतिविधियां।
अगर समाज समय रहते इस समस्या को गंभीरता से लेता है और युवाओं को स्वस्थ दिनचर्या अपनाने के लिए प्रेरित करता है, तो आने वाली पीढ़ी को इस बढ़ते मानसिक संकट से बचाया जा सकता है। अच्छी नींद न केवल शरीर को आराम देती है बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन की आधारशिला भी होती है।
