
परंपरा और संवेदना का संगम: उत्तर प्रदेश के इस गांव में नगाड़े की थाप से खत्म होता है शोक, होली से पहले निभाई जाती है खास रस्म
भारत के ग्रामीण समाज में त्योहार केवल उत्सव नहीं होते, बल्कि वे रिश्तों, संवेदनाओं और सामाजिक एकता के प्रतीक भी होते हैं। ऐसी ही एक अनूठी परंपरा ब्रज क्षेत्र के एक छोटे से गांव में आज भी जीवित है, जहां होली से पहले उन घरों के बाहर नगाड़ा बजाया जाता है जिन परिवारों में वर्ष भर के दौरान किसी सदस्य का निधन हुआ हो। यह परंपरा न केवल शोकग्रस्त परिवारों को सांत्वना देती है, बल्कि उन्हें फिर से समाज और त्योहारों की खुशियों से जोड़ने का माध्यम भी बनती है।

महाशिवरात्रि से शुरू होती है रस्म
मांट इलाके के गांव जाबरा में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। यहां महाशिवरात्रि के बाद से ही होली के गीतों की शुरुआत हो जाती है। जिन घरों में पिछले एक साल में किसी की मृत्यु हुई होती है, वहां गांव के लोग एकत्र होकर नगाड़ा बजाते हैं और पारंपरिक होली रसिया गाते हैं।
नगाड़े की गूंज पूरे गांव को यह संदेश देती है कि दुख की घड़ी बीत चुकी है और अब समाज मिलकर उस परिवार को खुशियों में शामिल करना चाहता है। स्थानीय लोग इसे “त्योहार उठाना” कहते हैं, जिसका अर्थ है शोक की अवधि समाप्त कर परिवार को फिर से सामाजिक जीवन में शामिल करना।
सांत्वना का सामूहिक रूप
इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि इसमें पूरा गांव सहभागी बनता है। लोग समूह बनाकर शोकग्रस्त परिवार के घर पहुंचते हैं, नगाड़ा बजाते हैं, होली के गीत गाते हैं और परिवार को सांत्वना देते हैं। यह केवल रस्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश है कि दुख में व्यक्ति अकेला नहीं होता, समाज उसके साथ खड़ा रहता है।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि जब तक यह सामूहिक कार्यक्रम नहीं होता, तब तक परिवार त्योहार नहीं मनाता। इस परंपरा के बाद ही वे सामान्य जीवन में लौटते हैं और होली जैसे उत्सव में भाग लेते हैं।
सामाजिक एकता की मिसाल
ग्रामीणों के अनुसार, इस परंपरा से लोगों के बीच अपनापन और सहयोग की भावना बढ़ती है। जब गांव के लोग स्वयं किसी के घर जाकर उसे सांत्वना देते हैं, तो दुख का बोझ हल्का हो जाता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि आज के समय में जब शहरों में लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं, तब गांवों की ऐसी परंपराएं समाज को जोड़ने का काम करती हैं। यह परंपरा सिखाती है कि त्योहार केवल खुशी मनाने के लिए नहीं, बल्कि दुख बांटने के लिए भी होते हैं।
हर साल निभाई जाती है परंपरा
ग्रामीणों के मुताबिक, हर वर्ष जिन परिवारों में मृत्यु होती है, वहां यह रस्म निभाई जाती है। इस दौरान गांव के कई लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं और पारंपरिक ढंग से कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
नगाड़े की आवाज, होली के गीत और ग्रामीणों की उपस्थिति शोकग्रस्त परिवार को यह एहसास दिलाती है कि उनका दुख केवल उनका नहीं, पूरे समाज का है। यही भावना इस परंपरा को खास बनाती है।
ब्रज की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा
ब्रज क्षेत्र अपनी होली के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां लठमार होली, फूलों की होली और हुरंगा जैसे आयोजन देखने को मिलते हैं, लेकिन जाबरा गांव की यह परंपरा अपनी संवेदनशीलता के कारण अलग पहचान रखती है।
यह परंपरा दिखाती है कि भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल रंग और उल्लास का नाम नहीं, बल्कि भावनाओं और रिश्तों की गहराई का प्रतीक भी हैं। नगाड़े की थाप यहां केवल संगीत नहीं, बल्कि संवेदना की आवाज बनकर गूंजती है।
परंपरा जो जोड़ती है दिल
गांव के लोगों का कहना है कि इस रस्म का उद्देश्य किसी की पीड़ा को कम करना है। जब पूरा गांव किसी एक परिवार के दुख में शामिल होता है, तो उस परिवार को मानसिक शक्ति मिलती है और वे जीवन में आगे बढ़ने का साहस जुटा पाते हैं।
आज भी यह परंपरा बिना किसी औपचारिकता के निभाई जाती है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि यह गांव अपनी इस सामाजिक संवेदना के लिए आसपास के इलाकों में जाना जाता है।
इस तरह जाबरा गांव की यह परंपरा केवल एक सांस्कृतिक रस्म नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की मिसाल है। यह बताती है कि भारतीय समाज में त्योहारों का असली अर्थ केवल खुशी मनाना नहीं, बल्कि दुख में साथ खड़े रहना भी है।



