
दिल्ली मेट्रो में नाम बदलने का मुद्दा: ‘सुप्रीम कोर्ट’ स्टेशन को ‘सर्वोच्च न्यायालय’ करने पर बढ़ेगा खर्च और प्रशासनिक चुनौतियां
दिल्ली में मेट्रो स्टेशन के नाम को लेकर एक नया प्रशासनिक और वित्तीय विवाद सामने आया है। दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) ने अदालत को बताया है कि ‘सुप्रीम कोर्ट’ मेट्रो स्टेशन के हिंदी साइनेज को बदलकर ‘सर्वोच्च न्यायालय’ करना इतना सरल नहीं है, जितना पहली नजर में लगता है। इस बदलाव पर लगभग 40 से 45 लाख रुपये तक का खर्च आने का अनुमान है, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन है, जहां मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई हुई। डीएमआरसी की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि नाम बदलने का असर केवल स्टेशन के बोर्ड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मेट्रो के रूट मैप, मोबाइल एप्लिकेशन, डिजिटल डिस्प्ले, ऑडियो अनाउंसमेंट और अन्य सूचनात्मक सामग्री में भी व्यापक बदलाव करना पड़ेगा।
डीएमआरसी का तर्क है कि यह एक बहुस्तरीय प्रक्रिया होगी, जिसमें तकनीकी अपडेट, प्रिंट सामग्री में संशोधन और सूचना प्रणाली के पुनर्संयोजन शामिल होंगे। इन सबके कारण न केवल खर्च बढ़ेगा बल्कि संचालन संबंधी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।
हालांकि अदालत ने इस दलील पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह तर्क कि एक स्टेशन का नाम बदले जाने से अन्य स्टेशनों के लिए भी ऐसी मांगें उठ सकती हैं, किसी याचिका को खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता। न्यायालय ने डीएमआरसी को निर्देश दिया है कि वह इस मुद्दे पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करे, जिसमें खर्च, प्रक्रिया और संभावित प्रभावों का पूरा ब्यौरा हो।
यह मामला उमेश शर्मा की ओर से दायर जनहित याचिका पर आधारित है। याचिकाकर्ता का कहना है कि ‘सुप्रीम कोर्ट’ स्टेशन का हिंदी नाम देवनागरी लिपि में ‘सर्वोच्च न्यायालय’ होना चाहिए। उन्होंने अपने तर्क में आधिकारिक भाषा से जुड़े कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र सरकार से जुड़े संस्थानों और कार्यालयों में साइनेज हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में होना अनिवार्य है, और हिंदी देवनागरी लिपि में ही प्रदर्शित की जानी चाहिए।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि दिल्ली मेट्रो के कई अन्य स्टेशनों के नाम पहले से ही हिंदी में सही अनुवाद के साथ लिखे गए हैं। उदाहरण के तौर पर ‘सेंट्रल सेक्रेटेरिएट’ स्टेशन का हिंदी नाम ‘केंद्रीय सचिवालय’ लिखा जाता है। ऐसे में ‘सुप्रीम कोर्ट’ के लिए भी समान मानक अपनाया जाना चाहिए।
इस मुद्दे ने एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है, जिसमें भाषा, प्रशासनिक लागत और सार्वजनिक सुविधा तीनों पहलू शामिल हैं। एक ओर हिंदी को संवैधानिक और आधिकारिक भाषा के रूप में बढ़ावा देने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में बार-बार बदलाव से होने वाले खर्च और तकनीकी दिक्कतों को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मेट्रो जैसे विशाल नेटवर्क में नाम बदलने का प्रभाव केवल एक स्टेशन तक सीमित नहीं रहता। इसका असर यात्रियों की आदतों, डिजिटल मैपिंग सेवाओं, पर्यटन सूचना प्रणालियों और आपातकालीन संचार तक पड़ सकता है। इसलिए ऐसे फैसलों में भाषा नीति के साथ-साथ व्यावहारिकता और लागत का संतुलन भी जरूरी होता है।
अब इस मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में निर्धारित की गई है। तब तक डीएमआरसी को अपना विस्तृत पक्ष हलफनामे के रूप में प्रस्तुत करना होगा। अदालत के अंतिम निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि भाषा संबंधी नियमों को प्राथमिकता दी जाएगी या सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की लागत और कार्यप्रणाली को अधिक महत्व मिलेगा।



