
दिल्ली में फर्जी पीसीसी रैकेट का भंडाफोड़: तस्कर की गिरफ्तारी के बाद सिपाही और साथी की करतूत आई सामने
राजधानी दिल्ली में पुलिस की कार्रवाई के दौरान एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस तंत्र को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में एक व्यक्ति को पकड़ने के बाद जब पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाया तो पता चला कि इस पूरे मामले के पीछे दिल्ली पुलिस का ही एक सिपाही और उसका साथी फर्जी पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट (पीसीसी) बनाने का धंधा चला रहे थे। इस खुलासे के बाद पुलिस ने दोनों के खिलाफ अलग-अलग धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

नारकोटिक्स टीम की कार्रवाई से खुला राज
पूरे मामले की शुरुआत उस समय हुई जब दक्षिण-पूर्व जिला पुलिस की नारकोटिक्स यूनिट को इलाके में मादक पदार्थों की तस्करी की सूचना मिली। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आशीष नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया। तलाशी के दौरान उसके पास से करीब 18 ग्राम एमडीएमए बरामद हुआ, जो एक प्रतिबंधित नशीला पदार्थ है।
आशीष को हिरासत में लेकर जब उससे पूछताछ की गई तो उसने कुछ ऐसी जानकारी दी जिससे पुलिस को शक हुआ कि मामले में और भी लोग शामिल हो सकते हैं। इसके बाद पुलिस टीम ने उसके बताए पते पर छापेमारी करने का फैसला किया।
किराए के मकान में चल रहा था फर्जीवाड़ा
पुलिस की टीम सनलाइट कॉलोनी थाना क्षेत्र में स्थित एक मकान पर पहुंची, जहां आशीष किराए पर रहता था। जब पुलिस ने वहां छापा मारा तो मकान के अंदर दिल्ली पुलिस का सिपाही अरुण और उसका साथी तुषार मौजूद मिले।
पुलिस ने दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की। शुरुआती पूछताछ में ही कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। जांच के दौरान पता चला कि यह मकान केवल रहने के लिए नहीं बल्कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने के अड्डे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था।
मकान से मिली बड़ी संख्या में मुहरें और दस्तावेज
जब पुलिस ने मकान की तलाशी ली तो वहां से कई अहम सबूत बरामद हुए। कमरे में अलग-अलग जगहों पर दिल्ली पुलिस और अन्य पुलिस अधिकारियों की मुहरें, कई सरकारी स्टाम्प और फर्जी पहचान पत्र रखे हुए थे।
इसके अलावा पुलिस को कई तैयार किए गए फर्जी पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट भी मिले। इन दस्तावेजों को देखकर साफ हो गया कि आरोपी लंबे समय से इस काम में लगे हुए थे।
दिल्ली पुलिस का सिपाही निकला आरोपी
पुलिस अधिकारियों के अनुसार इस मामले में गिरफ्तार अरुण दिल्ली पुलिस में सिपाही है और वह शाहीन बाग थाने में तैनात है। अरुण मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले का रहने वाला है।
जानकारी के मुताबिक उसे अपने पिता की जगह अनुकंपा के आधार पर दिल्ली पुलिस में नौकरी मिली थी। वह वर्ष 2017 बैच का सिपाही है और कई सालों से दिल्ली में सेवा दे रहा था। लेकिन नौकरी के साथ-साथ वह गैरकानूनी गतिविधियों में भी शामिल हो गया।
पुलिस मित्र रहा तुषार निभा रहा था साथ
इस फर्जी रैकेट में अरुण का साथी तुषार भी बराबर का भागीदार था। तुषार उत्तर प्रदेश के पिलखुआ का रहने वाला है और पहले कई थानों में पुलिस मित्र के रूप में काम कर चुका है।
पुलिस मित्र होने के कारण उसे पुलिस की कार्यप्रणाली और दस्तावेजों की प्रक्रिया के बारे में अच्छी जानकारी थी। इसी जानकारी का फायदा उठाकर वह अरुण के साथ मिलकर फर्जी पीसीसी तैयार करता था।
जल्दी पीसीसी दिलाने का देते थे लालच
जांच में यह भी पता चला कि आरोपी लोगों को जल्दी पीसीसी दिलाने का लालच देते थे। आम तौर पर दिल्ली पुलिस के माध्यम से पीसीसी बनवाने में करीब 10 से 15 दिन का समय लगता है।
लेकिन आरोपी दावा करते थे कि वे कुछ ही घंटों में पीसीसी बनाकर दे सकते हैं। इस झांसे में आकर कई लोग उनसे संपर्क करते थे।
लोगों से वसूली जाती थी मोटी रकम
आरोपी हर पीसीसी बनाने के बदले लोगों से 1000 से 2000 रुपये या उससे ज्यादा पैसे लेते थे। जबकि आधिकारिक प्रक्रिया के तहत दिल्ली पुलिस केवल 10 रुपये का शुल्क लेकर पीसीसी जारी करती है।
पुलिस का अनुमान है कि आरोपी अब तक सैकड़ों लोगों को फर्जी पीसीसी दे चुके हैं। आरोपियों के मोबाइल फोन की जांच में भी कई लोगों के नाम और उनके बनाए गए दस्तावेज मिले हैं।
एचएचओ की मुहर लगाकर तैयार होते थे कागजात
जांच के दौरान पुलिस को यह भी पता चला कि आरोपी असली दस्तावेज की तरह दिखने वाले फर्जी पीसीसी तैयार करते थे। इन दस्तावेजों पर एचएचओ यानी हाउस ऑफिसर की नकली मुहर लगाई जाती थी ताकि लोगों को शक न हो।
दिल्ली पुलिस में असली पीसीसी स्पेशल ब्रांच द्वारा जारी किया जाता है। लेकिन आरोपी इस प्रक्रिया को दरकिनार कर अपने स्तर पर ही नकली दस्तावेज तैयार कर रहे थे।
नशे के कारोबार से भी जुड़ाव
पुलिस सूत्रों के मुताबिक जांच के दौरान यह भी पता चला है कि आरोपी मादक पदार्थों की तस्करी से भी जुड़े हुए थे। बरामद एमडीएमए खरीदने के लिए सिपाही अरुण ने अपने मोबाइल फोन से भुगतान किया था।
इससे यह शक और मजबूत हो गया है कि यह गिरोह केवल फर्जी दस्तावेज बनाने तक सीमित नहीं था बल्कि नशे के कारोबार में भी सक्रिय हो सकता है।
मकान से मिली विदेशी युवती
छापेमारी के दौरान पुलिस को मकान से एक विदेशी युवती भी मिली। बताया जा रहा है कि वह उज्बेकिस्तान की रहने वाली है और कुछ समय से आरोपियों के साथ रह रही थी।
पुलिस अब यह जांच कर रही है कि युवती का इस पूरे मामले से क्या संबंध है और क्या वह भी किसी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल थी।
दो अलग-अलग मामलों में दर्ज हुई एफआईआर
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की हैं। एक मामला मादक पदार्थों की बरामदगी से जुड़ा है, जबकि दूसरा मामला फर्जी पहचान और फर्जी पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट बनाने से संबंधित है।
दक्षिण-पूर्व जिला पुलिस के उपायुक्त डॉ. हेमंत तिवारी ने भी इस पूरे मामले की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि पहचान बदलकर फर्जी दस्तावेज बनाने का मामला सामने आया है और इसकी जांच की जा रही है।
पीसीसी का महत्व
पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है, जिसका इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण कामों में किया जाता है। यह प्रमाणित करता है कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
आमतौर पर यह दस्तावेज विदेश यात्रा, वीजा आवेदन, नौकरी या किराएदार सत्यापन के लिए जरूरी होता है।
आगे की जांच जारी
फिलहाल पुलिस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि आरोपियों से पूछताछ के दौरान और भी कई खुलासे हो सकते हैं। यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस रैकेट से और कौन-कौन लोग जुड़े हुए हैं।
पुलिस का मानना है कि आने वाले समय में इस मामले में और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं। फिलहाल इस खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि कानून के रखवाले ही जब कानून तोड़ने लगें तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।



