
खामोश क़ातिल: जंगलों की आग हर साल उगल रही 14.3 करोड़ टन ज़हर, सांस के साथ शरीर में घुस रहा मौत का धुआं
दुनिया के जंगलों में धधकती आग अब सिर्फ पेड़ों को नहीं जला रही, बल्कि इंसानों की सांसों में ज़हर भर रही है। ताज़ा वैज्ञानिक खुलासे बताते हैं कि जंगलों की आग हर साल 14.3 करोड़ टन जहरीले प्रदूषक हवा में छोड़ रही है। यह आंकड़ा पहले के अनुमानों से 21 फीसदी ज्यादा है और इसे वैज्ञानिक “खामोश जैविक हमला” तक कह रहे हैं।

एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन ने साफ कर दिया है कि जंगलों, घास के मैदानों और पीटलैंड में लगने वाली आग से उठने वाला धुआं अब सीधे इंसानी सेहत पर वार कर रहा है। 1997 से 2023 तक के वैश्विक आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि यह प्रदूषण इतना सूक्ष्म और खतरनाक है कि आम इंसान को इसका अहसास भी नहीं होता—लेकिन असर जानलेवा होता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, जंगलों की आग से निकलने वाला धुआं केवल कार्बन डाइऑक्साइड तक सीमित नहीं है। इसमें ऐसे इंटरमीडिएट और सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स शामिल हैं, जो गर्मी में गैस बनते हैं और फिर हवा में तैरते हुए बेहद महीन कणों में बदल जाते हैं। यही कण फेफड़ों के सबसे अंदरूनी हिस्से तक पहुंचकर अस्थमा, कैंसर, हार्ट अटैक और समय से पहले मौत का खतरा कई गुना बढ़ा देते हैं।
हज़ारों किलोमीटर दूर तक फैल रहा ज़हर
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट इस खतरे को और डरावना बना देती है। रिपोर्ट के अनुसार, गंगा के मैदानों की जहरीली धुंध और अमेजन के जंगलों की आग से उठने वाला धुआं अब सीमाएं नहीं मानता। 2024 में अमेजन में लगी भीषण आग का धुआं हजारों किलोमीटर दूर बसे शहरों तक पहुंच गया और वहां की हवा को भी जहरीला बना दिया।
अमेजन, कनाडा और साइबेरिया जैसे इलाकों में लगी आग ने PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। ये वही कण हैं जो आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन सांस के साथ सीधे खून में घुस जाते हैं।
2001 के बाद आग ने तोड़े सारे रिकॉर्ड
जर्नल साइंस में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन ने इस संकट को और भी भयावह बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2001 के बाद से जंगलों की आग से निकलने वाले CO₂ उत्सर्जन में करीब 60 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। उत्तरी बोरियल वनों में यह उत्सर्जन लगभग तीन गुना तक पहुंच चुका है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अब उत्सर्जन का केंद्र सिर्फ उष्णकटिबंधीय जंगल नहीं रहे। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से बाहर के जंगल हर साल करीब 50 करोड़ टन अतिरिक्त CO₂ हवा में छोड़ रहे हैं। यह संकेत है कि आग का दायरा और उसका असर दोनों तेजी से फैल रहे हैं।
लंबा होता जा रहा ‘आग का मौसम’
तस्मानिया विश्वविद्यालय के शोध ने एक और खतरनाक सच्चाई उजागर की है—जंगलों में आग का मौसम अब पहले से कहीं ज्यादा लंबा हो गया है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और सूखा जंगलों को बारूद के ढेर में बदल रहे हैं, जहां एक छोटी सी चिंगारी भी तबाही मचा सकती है।
चेतावनी साफ है
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जंगलों की आग पर तुरंत और सख्त नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में दुनिया को सिर्फ जलवायु संकट ही नहीं, बल्कि एक वैश्विक स्वास्थ्य आपदा का भी सामना करना पड़ सकता है। यह आग अब पेड़ों को नहीं, इंसानों के भविष्य को जला रही है।
