
अदृश्य खतरा—भूजल में यूरेनियम की बढ़ती मौजूदगी से देश के स्वास्थ्य पर मंडरा रहा संकट
भारत में जल को जीवन का आधार माना जाता है, लेकिन जब यही पानी स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाए, तो स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। हाल के आंकड़ों ने एक ऐसी ही चिंताजनक सच्चाई को उजागर किया है—देश के कई हिस्सों में भूजल में यूरेनियम की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। यह समस्या धीरे-धीरे सामने आई है, लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी और व्यापक हो सकते हैं

एक राष्ट्रीय स्तर की निगरानी के तहत देश के विभिन्न राज्यों से हजारों भूजल नमूनों की जांच की गई। इस अध्ययन में 18 राज्यों के 151 जिलों को शामिल किया गया, जहां से कुल 14,377 नमूनों का विश्लेषण किया गया। परिणाम चौंकाने वाले रहे—कई स्थानों पर यूरेनियम की सांद्रता सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाई गई। कुछ इलाकों में यह स्तर 2,876 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक दर्ज किया गया, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों से बेहद ऊपर है।
पेयजल की गुणवत्ता को लेकर वैश्विक स्तर पर दिशा-निर्देश देने वाली संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पानी में यूरेनियम की अधिकतम सुरक्षित सीमा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है। लेकिन जांच में सामने आया कि कई क्षेत्रों में यह सीमा 90 गुना से भी अधिक पार हो चुकी है। यह संकेत देता है कि समस्या केवल स्थानीय नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर फैल चुकी है।
इस अध्ययन को देश में पहली बार इतने बड़े स्तर पर अंजाम दिया गया, जिसकी शुरुआत 2019-20 में हुई थी। इस पहल का नेतृत्व सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड ने किया। इसका उद्देश्य देश में भूजल की गुणवत्ता की वास्तविक स्थिति को समझना और भविष्य की नीतियों के लिए आधार तैयार करना था। रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल पानी की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता भी एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।
राज्यवार स्थिति पर नजर डालें तो पंजाब इस संकट का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहां भूजल में यूरेनियम की मात्रा सबसे अधिक पाई गई है। यदि परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड द्वारा तय 60 माइक्रोग्राम प्रति लीटर की सीमा को आधार माना जाए, तो भी राज्य के लगभग 6 प्रतिशत जल स्रोत इस सीमा से ऊपर हैं। इसका अर्थ है कि बड़ी आबादी ऐसे पानी का उपयोग कर रही है, जो दीर्घकालिक रूप से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
दिल्ली और हरियाणा जैसे क्षेत्रों में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। दिल्ली में करीब 5 प्रतिशत और हरियाणा में 4.4 प्रतिशत जल स्रोतों में यूरेनियम की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है। इसके अलावा देश के अन्य हिस्सों—जैसे तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और झारखंड—में भी इस समस्या के संकेत मिले हैं। भले ही इन राज्यों में प्रतिशत अपेक्षाकृत कम है, लेकिन यह इस बात का प्रमाण है कि समस्या व्यापक रूप से फैल चुकी है।
भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी के पीछे कई कारण हो सकते हैं। प्राकृतिक कारणों में भू-वैज्ञानिक संरचना प्रमुख है। कुछ क्षेत्रों की मिट्टी और चट्टानों में यूरेनियम स्वाभाविक रूप से मौजूद होता है, जो समय के साथ पानी में घुल जाता है। इसके अलावा अत्यधिक भूजल दोहन भी इस समस्या को बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे गहराई में मौजूद खनिज ऊपर आ जाते हैं।
मानव गतिविधियां भी इस संकट को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग और खनन गतिविधियां भूजल को दूषित कर सकती हैं। इन प्रक्रियाओं के कारण पानी में विभिन्न प्रकार की भारी धातुएं मिल जाती हैं, जो धीरे-धीरे स्वास्थ्य के लिए खतरा बनती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यूरेनियम युक्त पानी का लंबे समय तक सेवन करना बेहद खतरनाक हो सकता है। इसका सबसे अधिक असर किडनी पर पड़ता है, क्योंकि यूरेनियम एक रासायनिक रूप से विषैला तत्व है। यह गुर्दों की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है और गंभीर मामलों में किडनी फेल होने का खतरा भी बढ़ा सकता है। इसके अलावा यह हड्डियों को कमजोर कर सकता है और लंबे समय में कैंसर जैसी बीमारियों की संभावना को भी बढ़ा सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम का रासायनिक प्रभाव उसके रेडियोधर्मी प्रभाव से अधिक नुकसानदायक होता है। यानी इसका खतरा मुख्य रूप से शरीर में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं से जुड़ा है, न कि केवल विकिरण से। यही वजह है कि इसके सेवन से बचाव बेहद जरूरी है।
यह समस्या खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अधिक गंभीर है, जहां अधिकांश लोग पीने के लिए भूजल पर निर्भर रहते हैं। बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए यह खतरा और अधिक संवेदनशील है। इन वर्गों की शारीरिक क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है, जिससे यूरेनियम का प्रभाव जल्दी और गहराई से पड़ सकता है।
एक अहम मुद्दा यह भी है कि भारत में अभी तक यूरेनियम की मात्रा को लेकर कोई स्पष्ट राष्ट्रीय मानक तय नहीं किया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानक मौजूद हैं, लेकिन देश में इनके अनुरूप ठोस नियमों की कमी है। यह स्थिति नीति निर्माण के स्तर पर एक बड़ी चुनौती को दर्शाती है।
इस संकट से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। सबसे पहले प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर वहां सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। जल शुद्धिकरण तकनीकों का उपयोग बढ़ाना होगा, जैसे रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) और अन्य आधुनिक फिल्ट्रेशन सिस्टम। इसके साथ ही लोगों को इस समस्या के प्रति जागरूक करना भी बेहद जरूरी है।
सरकार को भूजल के अत्यधिक दोहन को नियंत्रित करने, जल संरक्षण को बढ़ावा देने और औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त निगरानी रखने की जरूरत है। साथ ही, वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित कर इस समस्या के दीर्घकालिक समाधान खोजने होंगे।
अंततः यह स्पष्ट है कि भूजल में यूरेनियम की बढ़ती मात्रा एक “अदृश्य खतरा” है, जो धीरे-धीरे समाज को प्रभावित कर रहा है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह एक बड़े स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है। इसलिए जरूरी है कि सरकार, वैज्ञानिक समुदाय और आम जनता मिलकर इस चुनौती का सामना करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जल संसाधनों को सुनिश्चित करें।
